बुधवार, 30 सितंबर 2009

दूसरे रावण की तलाश में राम

मैं दशहरे की धूमधाम देखकर लौट रहा था कि देर रात राम से मुलाकात हो गई। जटाएँ बिखरी हुई, पसीने से तरबतर, गैरिक वस्त्र धूल-धूसरित, चेहरे पर परेशानियों की अनगिनत रेखाएँ, आँखों में आँसू थामे हुए, तकरीबन पराजित से। पहले रामलीला में और फिर टीवी में उनकी शक्ल देखते हुए उनसे पुराना परिचय-सा लगा। बिना कुछ सोचे-विचारे मैंने उनसे उनका हाल पूछा-

-कुछ परेशान से दिख रहे हैं राम। हमें लगता है आपने आज ढेरों रावण मारे हैं। रावण मार-मारकर थक गए हैं?

-नहीं वत्स! तुमने गलत समझ लिया। मैं शाम से ही रावण को खोज रहा हूँ। हाथ में धनुष बाण लिए रावण की तलाश में भटक रहा हूँ, लेकिन रावण का कोई अता-पता नहीं। मैं चिंतित हूँ कि अगर आज की रात रावण नहीं मार पाया तो रावण कैसे मरेगा और लोग मुझे राम कैसे मानेंगे?

-शाम से ही धू-धू कर इतने रावण जल रहे हैं और आप कहते हैं कि आपको रावण मिला ही नहीं। आज तो पूरे शहर में केवल रावण ही रावण दिख रहा था। आप कैसे राम हैं?

-मेरी यही तो मुश्किल है। मैं कैसे बताऊँ कि मै कैसा राम हूँ। आज जगह-जगह नकली रावण खड़े थे और उन्हें नकली राम मार रहे थे। मैं रावण की तलाश में जहाँ भी गया लोगों ने मुझे राम मानने से इंकार कर दिया।

-कोई बात नहीं प्रभु, चलिए मैं एक रावण बनाता हूँ और आप उसका वध करिएगा। मैं उसमें दो-चार बम रख दूँगा। एटम बम जैसी आवाज होगी। मोहल्ले के बच्चे ताली बजाएँगे। आपको भी मजा आएगा और बच्चों को भी।

-मैं मजे लेने के लिए इस धरती पर नहीं घूम रहा हूँ वत्स! मैं तो आज सचमुच ही रावण मारने निकला था, लेकिन वह जाने कहाँ छिपा बैठा है।

-आप तो अंतर्यामी हैं। जरूर जानते होंगे कि वह कहाँ छिपा है। आँखें बंद करके देखिए न!

-जिस रावण को मैंने पहली बार मारा था, वह धरती का सबसे मायावी राक्षस माना जाता था। इसके बाद भी मैने उसका वध किया। अब जिस रावण का मैं पीछा कर रहा हूँ, वह उससे भी मायावी, उससे भी चतुर, उससे भी ज्ञानी और उससे भी अधिक अपराजेय है।

-कैसे?

-आज शाम को जब मैंने पहली बार रावण को तलाशा तो वह अट्टहास करता मिला। मेरा उपहास करता हुआ। दूर से ही चिल्लाते हुए उसने कहा कि तुम क्या अब तो सारे देवी-देवता मिलकर भी मुझे नहीं मार सकते। उसके दस सिर गर्व से तने हुए थे। हँसता भी दस मुखों से था। मैं अपनी सारी शस्त्र विद्याओं के बलबूते मारने के लिए जैसे ही उसके पास गया, उसने अपने नौ सिर झट से छिपा लिए और भद्र दिखने लगा। मैने उसकी माया मारने के लिए जैसे ही तीर धनुष पर चढ़ाया, सारी जनता मेरी ओर दौड़ पड़ी। कहने लगी यह मेरा अन्नदाता है। मेरा पालनहार। इस पर वार करने वाले तुम कौन हो। मेरी जयकार करने वाले सारे लोग उस तरफ दिखे और मैं वहाँ से अपनी जान बचाकर भागा। मैं अपने भक्तों को मार नहीं सकता और भक्त मुझे मारें यह देवताओं को अच्छा नहीं लगेगा।

-फिर क्या हुआ?

-मैने उसी रावण को फिर दूसरी शक्ल में देखा। उसे लगा कि आज नहीं तो कल लोग मुझे पहचान जाएँगे। इसलिए उसने अपने दस सिरों का विसर्जन कर लिया। उसने मेरी ही शक्ल धारण कर ली। जगह-जगह रावण की जगह राम दिखाई दे रहे हैं। जैसे बालि-सुग्रीव युद्घ में बालि को पहचानने में मुश्किल हो रही थी, उसी तरह राम की शक्ल में रावण को पहचानना मुश्किल है। मैं जानता हूँ रावण अभी नहीं मरा है, फिर भी असहाय हूँ। मैंने एक चीज और देखी है..

-वह क्या प्रभु!

-अब लोग रावण के अभ्यस्त हो गए हैं। अब उन्हें रावण राक्षस नहीं लगता। जब साधुओं और सज्जनों को त्रस्त करता है तो लो कहते हैं, यह उसका काम है। जब सीता पर कुदृष्टि डालता है, तब भी लोग यही कहते हैं। सोने की लंका देखकर भी लोग सहज ही कह देते हैं कि वह राजा है, सोने की लंका उसकी नहीं होगी तो गंगू तेली की होगी? पहले तो रावण सज्जनों के खून और उनकी हड्डियाँ लेता था, तो कुछ तकलीफ भी होती थी। अब तो कभी-कभार केवल वोट लेता है, इसलिए लोगों को तनिक भी तकलीफ नहीं होती?

-तो क्या अब वह इसी तरह जीवित रहेगा? उसके अंत का कोई उपाय नहीं?

-चिंता मत करो वत्स! अब मैं उसे 'वोट' बनकर मारूँगा। मैं जल्द ही 'मतावतार' लूँगा।

2 टिप्‍पणियां:

समयचक्र - महेंद्र मिश्र ने कहा…

बढ़िया व्यंग्य . वैसे अब रामचंद्र जी रावण के लिए यह गाना गायेंगे " अगले वरस तू दशहरा पर जल्दी आ"

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

लगता है मीठी नहीं दिखलाई दे रहा है
मिर्ची पढ़कर
दूर से ही लोग गुजर रहे हैं
आप कोई उपाय कीजिए
इसके साथ नींबू भी लटका लीजिए।