शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

सुरक्षा की कमर

सरकारें सुरक्षा की कमर कसने में लगी हुई हैं। दिन-रात एक किए हुए हैं। सरकारें कमर कसती जाती हैं और सुरक्षा का अधोवस्त्र नीचे खिसकता जाता है। जबसे यह देश बना है, तबसे ऐसा ही होता आ रहा है। वे भीतर कमर कसती हैं और बाहर आकर चिल्लाती हैं कि जो हमारी ओर बुरी नजर से देखेगा उसे वक्त आने पर करारा जवाब देंगे। सुरक्षा की कोमल काया पर बुरी नजरों के काले साँप लोट रहे हैं और जवाब संदूक से बंदूक तक नहीं पहुँच पा रहा है।

दरअसल हमारे सुरक्षा की कमर बिहारी के नायिका की तरह इतनी दुबली, पतली और लचीली है कि उसे छूना तो दूर देखा भी नहीं जा सकता। वर्षों से सरकार की एजेंसियाँ उसकी खोज में तल्लीन हैं, लेकिन वह उसी तरह लापता है जैसे गाँधीवादियों के यहाँ गाँधीवाद और समाजवादियों के यहाँ समाजवाद। उस कमर को ढूढ़ने में जब सीबीआई और रॉ के हाथ-पाँव फूल रहे हैं तो भला आम आदमी के हाथ उस तक कैसे पहुँच सकते हैं। समझ में नहीं आता कि जब सुरक्षा की कमर मिल ही नहीं रही तो सरकारें कस किसे रही हैं। कुछ देर के लिए अगर सरकार की बात पर भरोसा कर भी लें और मान लें कि कमर में कसाव आ रहा है तो फिर बार-बार पतलून अधोगामी क्यों होती है? क्या सरकारों ने उसकी कमर इतनी चिकनी कर दी है कि उस पर कोई कमरबंद टिकता ही नहीं?

सुरक्षा की कमर तलाशना और उसे कसना तलवार की धार पर चलने जैसा है। सुरक्षा की अलग-अलग कमर के लिए अलग-अलग नाड़े हैं। अगर कसाव आया तो उसी से आएगा। सरहदों की सुरक्षा की कमर सेना के नाड़े से कसती है तो शहर के सुरक्षा की पुलिस के नाड़े से। नक्शे और खसरे की कमर पटवारी का नाड़ा कसता है तो शिक्षा की कमर शिक्षक के हवाले है। वैद्य जान की कमर के कमरबंद हैं तो इंजीनियर बाँध की कमर के। कसते समय यदि नाड़े बदल गए तो सुरक्षा की कमर मुश्किल में समझिये।

सेना का नाड़ा सियासत की कमर में बँधा तो पाकिस्तान और सियासत का नाड़ा सेना की कमर में बँधा तो हिंदुस्तान नामक देश का जन्म होता है। नेताओं के नाड़े से पुलिस की कमर कसी तो शहर में नाना प्रकार के दंगे होते हैं। इंजीनियर के नाड़े से डॉक्टर की कमर कस गई तो कैंची मरीज के पेट में छूट जाती है। मुश्किल यह है कि सारे नाड़ों को गलत कमर से मोहब्बत हो गई और कमर ढीली होने का पाप बेचारी सरकार के सिर जा रहा है।

कमर के जानकार कहते हैं कि सुरक्षा की कमर इसलिए नहीं मिल रही है क्योंकि उसे सरकार ने व्यवस्था की तरह कस-कसकर तोड़ दिया है। राज्य से लेकर देश की सरकारें तक उसे इतना कसती हैं कि या तो नाड़ा टूट जाता है या कमर। नाड़े तो बदलते रहते हैं इसलिए उनके टूटने का न दर्द होता और न पता चलता, लेकिन कमर टूटती है तो बच्चा-बच्चा चीखने लगता है और गली-गली में शोर हो जाता है। टूटी कमर लेकर वह सरकार के कदमों में झुकने को लाचार है। जानकारों से उलट सरकार का कहना है कि सुरक्षा की कमर पड़ोसी मुल्कों और वहाँ से भेजे आतंकवादियों ने तोड़ी है। हम तो इस कोशिश में लगे हैं कि अमेरिका से कोई अस्थिरोग विशेषज्ञ बुलवा लें और फिर से उसे कमरबंद के योग्य बना लें।

कुल मिलाकर वोटर नामक जनता को अगर इस देश में जीना है तो उसे अपनी कमर खुद कसनी होगी, अन्यथा सरकारें उसकी कमर भी कस-कसकर तोड़ देंगी।

1 टिप्पणी:

मीनू खरे ने कहा…

बहुत बढ़िया ओम भाई.मज़ा आया पढ़ कर. कृपया कमेंट बॉक्स में से वर्ड वेरीफिकेशन हटा दें.