बुधवार, 23 सितंबर 2009

माँ-भक्त संवाद-दो

-भक्तों ! तुम्हारी दृष्टि में नवरात्रि के नौ दिनों में भक्ति क्या है?
-चंदा इकठ्ठा करना, आपकी मूर्ति विराजना, गाना-बजाना करना, गरबे-डिस्कों अदि के शानदार आयोजन करना, खीर-पूड़ी की अच्छी परसादी बाँटना, समापन पर अच्छा बड़ा भंडारा करना, मूर्ति विसर्जित करने के लिए गाजे-बाजे के साथ जाना, आपकी प्रतिमा को नदी में प्रवाहित कर देना और फिर बचे हुए चंदे से थोड़ा-बहुत पीने-खाने का आयोजन कर लेना। इस नवधा भक्ति के बाद थकान उतारना भी तो जरूरी है माँ।

-भक्तों! मेरी आरती बिना डीजे के नहीं हो सकती क्या?
-पड़ोसी पांडाल में देखा है कितना आधुनिक डीजे बजता है। वहाँ तो मुम्बई से भजन गाने वाली और गरबा करने वाली हिरोइने भी आई हैं। सुना है कुछ बार बालाएँ भी हैं। गुजरात और बंगाल से भी हिरोइनें आती हैं। लोकल सारी सुंदर युवतियाँ भी उसी पांडाल पर जाकर नृत्य करती हैं। वो तो अपने पांडाल में घुसने की भी फीस लेता है। इसके बाद भी वहाँ भीड़ उमड़ती है। पीने-खाने का कार्यक्रम भी रोज होता है। उसके मुकाबले तो अपना डीजे कमजोर ही है माँ।

-और कल झगड़ा किस बात को लेकर हुआ था?
-क्या कहूँ माँ, कल कुछ बेधर्मी इधर आ गए थे। अब जिनके सुल्तानों ने हमारे मंदिर तोड़े, हमारे धर्म को प्रदूषित किया, हमें सालों तक गुलाम बनाया, उनको हम कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। हम तो चाहते हैं कि उनको इस देश से ही बाहर निकाल दें, लेकिन सरकारें उनके तलवे चाट रही हैं। हम लोग इतना बड़ा आयोजन भी तो इसीलिए करते हैं कि हमारी ताकत देखकर उनकी फट जाए। कभी-कभार शस्त्रपूजा भी तो इसीलिए करते हैं। इसके बाद भी उनकी हिम्मत देखिए कि हमारी गली में घुस आते हैं। कल लगी-छनी का मामला था हो गई जूतम-पैजार।

-तुम लोग इतना हल्ला करते हो, बच्चे पढ़ नहीं पाते। बीमार लोग परेशान होते हैं।
-पढ़ने-लिखने से क्या होगा माँ। सिर्फ समय की बरबादी। हम लोग पढ़- लिखकर देखो वर्षों से तुम्हारी सेवा कर रहे हैं और जो लोग बिना पढ़े-लिखे हैं वो सरकार की सेवा कर रहे हैं। हम लोग चार-चार पैसे के चंदे में अपनी उम्र खपा रहे हैं। उनके घर करोड़ों का चंदा पहुँच रहा है। अब ज्यादा न कहलाओ माँ! तुम भी तो उन्हीं का भंडार भरती हो। हम लोगों की जिंदगी घिस गई सुबह-शाम की रोटी में मुश्किल हो रही है। रही बात बीमारों की तो महँगाई और जहालत में मरने से अच्छा है कि दिल-गुर्दा फेल होने से ही मर जाएँ।

-अच्छा यह बताओ कि इन नौ दिनों में अगर तुम लोग मेरी स्थापना कर यह आयोजन नहीं कर रहे होते तो क्या करते?
-माँ! तुम आजकल कितने प्रश्न करने लगी हो, लगता है अब तुम भी अंतर्यामी नहीं रहीं। पेट पालने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही है। कानून करने देता है तो कानून के भीतर करते हैं, नहीं करने देता तो कानून के बाहर करते हैं। वैसे अच्छा यह है कि अपने देश में कानून नाम की कोई बाधा नहीं है। अपने-अपने कायदे हैं-अपने कानून हैं। इसलिए जरूरत पड़ने पर सब कानून के दायरे में आ जाता है। सरकारें और कानून काम नहीं देते इसलिए हम कानून को ही काम देते हैं।
(जवाब सुनकर माँ एक बार फिर उदास हो गईं)

2 टिप्‍पणियां:

SUNIL DOGRA जालि‍म ने कहा…

बहुत खूब, मजा आ गया

हेमन्त कुमार ने कहा…

बढ़िया कसा आपने । आभार !