शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीप आज भी लड़ता है संग्राम

जिस देहरी पर दीप रखने के लिए
तरसते रहते थे महीनों
वह छूटी जा रही है धीरे-धीरे

जिस दीये की बाती बनाने के लिए
लड़ते थे सारे भाई-बहन
उसने भी बदल ली है अपनी शक्ल

जिन नए कपड़ों के लिए
नाराज हो जाते थे पिता से
उन्हें बेटे को दिलाने में अब फूल जाता है दम

जिन सपनों को देखकर
आखें रोज़ मनाती थीं दिवाली
आज वे हो रहे हैं अमावस से भी काले

पहले हम दिवाली मनाते थे
अब दिवाली हमें मनाती है
पहले हम ज़िंदगी जीते थे
अब ज़िंदगी हमें जीती है।

लेकिन दीप कल भी लड़ता था अंधेरे से संग्राम
आज भी लड़ता है
कल भी लड़ेगा।

दीपावली की शुभकामनाएँ...

-ओम द्विवेदी

6 टिप्‍पणियां:

Randhir Singh Suman ने कहा…

ज्योति पर्व के अवसर पर आप सभी को लोकसंघर्ष परिवार की तरफ हार्दिक शुभकामनाएं।

Gyan Darpan ने कहा…

दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें।

समयचक्र ने कहा…

ज्योति पर्व अवसर पर बधाई और शुभकामनाएं...

संगीता पुरी ने कहा…

दीपावली का ये पावन त्‍यौहार,
जीवन में लाए खुशियां अपार।
लक्ष्‍मी जी विराजें आपके द्वार,
शुभकामनाएं हमारी करें स्‍वीकार।।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया!


सुख औ’ समृद्धि आपके अंगना झिलमिलाएँ,
दीपक अमन के चारों दिशाओं में जगमगाएँ
खुशियाँ आपके द्वार पर आकर खुशी मनाएँ..
दीपावली पर्व की आपको ढेरों मंगलकामनाएँ!

-समीर लाल 'समीर'

deepak ने कहा…

अद्भुत कविता है | इस समय के विडम्बित विद्रूप को बखूबी बयान किया है आपने |