शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

आज मैं गाँधी बन गया

कल सुबह जब कैलेण्डर पलट रहा था, तभी इस बात का ज्ञान हो गया था कि आज २ अक्टूबर है और यह देश मोहनदास करमचंद गाँधी उर्फ महात्मा उर्फ राष्ट्रपिता का जन्मदिन मनाएगा। अतः हर साल की तरह एक बार फिर मेरे पास मौका था गाँधी बनने का। मैंने इस सुअवसर को झपटकर पकड़ा। बक्से में रखे खादी के कुरते को सुबह-सुबह ही धारण कर लिया। मल्टीनेशनल कंपनियों के सारे जींस, जूते, टी-शर्ट वगैरह संदूक में उसी तरह रख दिया जैसे सालभर खादी रखी रहती है। ३६४ दिन अगर बक्से को खादी का सुख मिलता है तो एक दिन जींस, टी-शर्ट और जूते वगैरह का सुख भी मिलना चाहिए।

अब इस बात में शंका-कुशंका तो रही नहीं कि गाँधीजी का जन्मदिन है तो पूरे दिन कार्यक्रम होंगे और सब जगह खादी धारण किए हुए अतिथिओं की जरूरत होगी। कार्यक्रमों की संख्या इतनी अधिक है कि खादीवाले हर इंसान को एक दिन का रोजगार अवश्य मिलेगा। मैंने अपने बदन टंगे कुरते को भरोसा दिलाया कि आज के दिन उदास होने की जरूरत नहीं है। शाम तक निश्चित ही तुम्हें एक भव्य कार्यक्रम मिलेगा और सारे लोग तुम्हारी ओर घूर-घूरकर देखेंगे। बक्से में रखे-रखे तुम्हारे भीतर जो बास समा गई है उस पर आज गुलाब के फूल भी शरमाएँगे।

खादी धारण करने के साथ ही मैंने हमेशा की तरह ढेर सारे संकल्प भी लिए-राष्ट्रपिता भले बन जाऊँ, राष्ट्रपति कभी नहीं बनूँगा। कोई कितना भी पकड़-पकड़ कर बनाए प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री जैसे राजनीतिक पदों पर बैठकर मैं अपना जीवन कलंकित नहीं करूँगा। अंग्रेजों के बनाए सारे पदों, यथा-एसपी, कलेक्टर, तहसलीदार, बाबू वगैरह बनकर अंगरेजों का पाप नही ढोऊँगा। प्यास से तड़फ-तड़फकर प्राण भले ही चले जाएँ, लेकिन मद्यपान नहीं करूँगा। भूखे मर जाऊँ लेकिन मांस नहीं खाऊँगा। आज के दिन किसी भी स्थिति में कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं करूँगा। दिनभर में दो-चार किलोमीटर पैदल जरूर चलूँगा। सालभर भले ही मैंने दूसरों के गाल पर चाटा जड़ा है, लेकिन आज अगर कोई एक गाल पर चाटा मारेगा तो मैं दूसरा गाल भी उसके आगे कर दूँगा। अगर कहीं सत्य बोलने का मौका मिला तो पूरी ईमानदारी से बोलूँगा। चोरी-भ्रष्टाचार से भरे पेट में आज पाप का एक दाना भी नहीं डालूँगा। पूरी तरह अस्तेय और अपरिग्रह। जायज और नाजायज दोनों किस्म की पत्नियों से कह दिया है कि आज ब्रह्मचर्य प्रयोग करूँगा। कल तक भले गरीब का खून चूसा हो, लेकिन आज उसे हरिजन कहूँगा और आज के दिन उसे समाज में सम्मान दिलवाऊँगा। घिन लगे तब भी कोढ़ियों की सेवा करूँगा। बस्तियों में झाड़ू लगाऊँगा। पत्नी से कह दिया कि चाहे जो हो जाए, आज टॉयलेट तुम्ही साफ करना, वरना मैं तुम्हें घर से बाहर निकाल दूँगा। वगैरह-वगैरह...

जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, संकल्पों के बोझ से हमारी कमर टूटने लगी। दोपहर को लगा कि खादी और संकल्प धारण किए हुए पूरे छः घंटे हो गए, लेकिन किसी नामुराद आयोजक की अब तक मुझ पर नहीं पड़ी। एक बारगी लगा कि सब उतार कर आले पर रख दूँ, लेकिन दूसरे पल फिर लगा कि अभी पूरा दिन है, देर रात तक आयोजन चलेंगे। किसी न किसी की नजर तो पड़ेगी। गत वर्ष तक जिन्होंने बुलाया था क्या वे सारे आयोजक हमें भूल गए होंगे। सालभर में क्या गाँधी के इतने सेवक तैयार हो गए कि मेरे जैसा पुराना गाँधीवादी भुला दिया गया।

दोपहर पल्ला झाड़कर चली गई और कोई नहीं आया। मैंने फिर भी सुबह लिया हुआ संकल्प कायम रखा और बकरी का एक गिलास दूध पीकर थोड़ा और इंतजार किया, फिर थोड़ी सलाद और चटनी लेकर दोपहर का खाना निपटाया। खाना पिछले साल की तरह ही बेस्वाद लगा। लगा अगर यह संकल्प पूरे तीन सौ पैंसठ दिन टिक गया तो जीवन नरक हो जाएगा। पीजा-बर्गर, मुर्ग-मसल्लम से लेकर खीर-पुडी तक हमारा नाम ले-लेकर मातम मनाएँगे। खैर...

भोजन प्रसाद के बाद बाहर निकला ही था कि दौड़ते हुए एक सज्जन आए और उन्होंने कहा कि मोहल्ले में गाँधी जयंती का आयोजन है, हम लोगों ने पार्षद को मुख्यअतिथि बनाया था, वह कहीं और चला गया। अब आप ही पधारिए, कार्यक्रम जल्दी करना है। हमें लगा कि हमने सुबह से जो इतने संकल्प ढोए हैं, क्या मोहल्ले के मुख्यआतिथ्य में ही उनका स्वर्गवास हो जाएगा। मैं अभी इतना भी तो नहीं गिरा हूँ कि मुख्यअतिथि बनने के लिए पार्षद का विकल्प बनूँ। मैंने सज्जन को यह कहते हुए झटपट मना किया कि अभी मुझे तीन बजे की प्रार्थना पर जाना है। शाम को बड़े मैदान पर गरीबों को कपड़े बाँटने के लिए मुख्यमंत्री को आना था, मुझे पता था कि इस अवसर पर एक गाँधीवादी का सम्मान किया जाना है और उन्हें फिलहाल कोई मिल नहीं रहा है। जो बड़ी सेटिंगवाले गाँधीवादी थे उन्हें दिल्ली में, जो उनसे थोड़ा कम थे, उन्हें भोपाल में सुबह ही सम्मानित किया जा चुका है। लोकल कोई इतना बड़ा गाँधीवादी नहीं, जो गाँधीगिरी के अलावा कुछ और न करता हो। मुख्यमंत्री के लोकल चमचों से इधर-उधर से कुछ जुगाड़ अपना भी था।

उधर भोपाल से मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर उड़ा होगा कि इधर हमारे पास कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता आया। मुझे अपने कुरते पर गर्व हुआ। मुख्यमंत्री से श्रेष्ठ गाँधीवादी का सम्मान लेकर मैं कुछ हल्का हुआ। घर आया, सम्मान को बैठक कक्ष में टांगा और दिनभर से जिस बोझ से कमर टूट रही थी, उसे उतारकर संदूक में रख दिया।

5 टिप्‍पणियां:

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

भविष्‍य से वर्तमान की ओर लौटते हुए
व्‍यंग्‍यकार के दमदार कदम।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर और समसामयिक पोस्ट है।

महात्मा गांधी जी और
पं.लालबहादुर शास्त्री जी को
उनके जन्म-दिवस पर नमन।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत जोर का तमाचा मारा है भाई, अगली २ अक्टूबर तक इन सभी "गांधीवादियों" के गाल लाल रहेगे !
बहुत बढ़िया !!

आज शास्त्री जी की भी जयंती होती है,कितने जानते है ??

भारत माता के सच्चे 'लाल', लाल बहादुर शास्त्री जी को मेरा शत शत नमन !

vivek. ने कहा…

Achha Hai... Sateek hai. Badhai.
ab is desh me Gandhi bhi sirf nautanki ki cheez hi ho kar rah gaye hain. 'Aatmhatya' par Gandhi kya sochte the?? Nischit taur par 'nishiddh', par agar RSS wale unhe baksh bhi dete aur aaj agar wo zinda rah jate to kam-se-kam is mudde par unhe apni raay badalni padti...main Gandhi ke Gujarat me hun, par lagta hai Gujarat se sabse pahle Gandhi ki Atma kooch kar gayee hai... Atma ke baare me kaha gaya hai wo azar-amar hai, shaayad Gandhiji ki aatma me kuch Kapoor-tatv hoga, Gujarat me rahte hue to yahee lagta hai..yahan to koi nam-o-nishan nahi dikhta...
He(Haay)Ram!!!

ओम द्विवेदी ने कहा…

आदरणीय अविनाशजी,
सर्वप्रथम गाँधी व्यंग्य की तारीफ और मेरी हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया। आपकी दूसरी चिंता कि लोग मिर्ची देखकर भाग रहे हैं, नींबू टांगू, से चिंतित नहीं हूँ। आप जैसे कुछ लोगों तक बात पहुँच रही है, क्या कम है। वैसे भी हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में ही जो साहित्य लिखा जा रहा है, उसे पढ़ने वाले कितने बचे हैं। नींबू तो पूरे हिंदी साहित्य पर टाँगने लायक है। मैंने आपकी रचनात्मक दुनिया में भी भ्रमण किया है। काफी समृद्घ है। स्नेह बनाए रखें।


आदरणीय मयंकजी और शिवम भाई,
गाँधी पोस्ट पढ़ने और उसकी प्रशंसा के लिए आपका आभारी हूँ।


भाई विवेक,
तुमने आदतन मेरे व्यंग्य को गहराई से पढ़ा। तकरीबन आलोचक की शक्ल में। इसके बाद भी वह अच्छा है, तब तो सचमुच अच्छा ही होगा। गुजरात में रहते हुए वहाँ से गाँधी की आत्मा को कपूर होते देखना तुम्हारे जैसे संवदेनशील रचनाकार के लिए जरूर मुश्किल होगा। दीपक तले सबसे गहरा अँधेरा होता है, मुझे लगता है कि अब इस मुहावरे को रेखांकित करने की जरूरत नहीं।


पुरानी पोस्ट पर टिप्पणी के लिए आप सबका भी बहुत-बहुत आभार। देर से कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए क्षमा सहित-
समयचक्र के भाई महेन्द्र मिश्र, भाई सुनील डोगरा, भाई हेमंत कुमार, भाई सुधाकर सोनी, सरिताजी, संगीता पुरी जी, भाई संजय तिवारी, मीनू खरेजी, वाणी गीत, उड़नतश्तरी, भावनाजी, डॉ.श्याम गुप्ता, भाई चंदन कुमार झा, दिगंबर नासवा, नारदमुनि।