हिंदी सिनेमा जितना समृद्घ है, हिंदी रंगमंच उतना ही विपन्न। फ़िल्म अभिनेता जितने मालामाल हैं, रंगमंच के कलाकार उतने ही कंगाल। आज़ादी के साठ साल बाद भी न तो उनके लिए कोई सरकारी योजना है और न ही उनके भरण पोषण के लिए कोई इंतज़ाम। परिणाम यह कि हिंदी रंगमंच की ओर रुख करने में भी युवाओं के पांव कंपकंपाते हैं। अगर वे हिंदी नाटकों की दुनिया में दाख़िल होते भी हैं तो इसलिए कि उन्हें देर-सबेर बॉलीवुड का टिकट चाहिए होता है। रंगममंच के लिए बड़े-बड़े कलाकारों का समर्पण अंततः पेट के आगे आत्म समर्पण कर देता है। परिणाम यह कि हिंदी रंगकर्म आज भी शौक़िया है और ज़्यादातर शौक़िया रंगकर्मियों के हाथ में ज़िंदा भी है।
वह निकट भविष्य में पूरी तरह व्यावसायिक हो पाएगा, इसमें संदेह है। इसके पीछे तर्कों की लंबी फ़ेहरिस्त है। नाटकों के लिए हर तरफ उपेक्षा भाव है। ज़्यादातर उत्तर भारत के पारिवारिक संस्कारों में रंगकर्मियों को आज भी 'भाड़' ही माना जाता है। जिनमें सीखने की जिज्ञासा है और जो रंगमंच को जीवन की मुख्यधारा में शामिल करना चाहते हैं, उनके लिए बेहतर प्रशिक्षण नहीं है। राष्ट्रीय नाट्य विद्याल नई दिल्ली और भारतेंदु नाट्य अकादमी लखनऊ को छोड़ दिया जाए तो कोई भी सरकारी संस्थान ऐसा नहीं है, जहां रंग प्रतिभा को निखारा और संवारा जाता हो। यहां भी इतनी कम सीटें हैं कि हज़ारों युवक वहां पहुंचने का ख़्वाब ही देखते रह जाते हैं। भोपाल का भारत भवन अब केवल प्रेक्षागृह ही रह गया है। जब तक ऐसे संस्थानों का विकेन्द्रीकरण नहीं होगा, तब तक छोटी-छोटी जगहों पर रंग रुचियों का अंकुर छायादार वृक्ष नहीं बनेगा।
नाटकों को मंच पर उतारने के लिए पहली ज़रूरत स्क्रिप्ट की होती है। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अच्छे हिंदी नाटक ऊंगलियों पर गिने जाने लायक़ हैं और उन्हें कई-कई बार मंचित किया जा चुका है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, मोहन राकेश जैसे कुछेक नाटककारों ने मौलिक नाट्य लेखन की शुरुआत की, लेकिन यह परंपरा समृद्घ होकर आगे नहीं बढ़ी। मराठी, बंगाली आदि अन्य भारतीय भाषाओं सहित विदेशी भाषाओं के अनुदित नाटकों के ज़रिए हिं

उपेक्षा का आलम यह है कि हिंदी क्षेत्र में एक शहर में एक सभागार भी ऐसा नहीं है जो विशुद्घ रूप से नाट्यकर्म के लिए हो। जो सभागार थोड़े से साधन संपन्न हैं, उनकी स्थिति इंदौर के रवीन्द्र नाट्य गृह की तरह है। उनका एक दिन का किराया ही इतना महंगा है कि कलाकार बिक जाए।शादी-बारात और सरकारी बैठकों के लिए बने सभागारों में ही जुगाड़कर रंगकर्मी नाटक करते हैं। इससे प्रस्तुति में वह प्रभाव पैदा नहीं होता जो व्यावसायिक रंगकर्म में झलकता है। दिल्ली में हिंदी रंगकर्म इसलिए भी केंद्रित है क्योंकि वहां एनएसडी के भारी-भरकम ख़र्चे पर नाटक होते हैं और तमाम नाट्य समारोहों में अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा विदेशी भाषाओं के नाटकों की भव्यता और दिव्यता दिखाई देती है। प्रेक्षागृह से लेकर रंगमंच की तमाम अन्य सहायक सामग्रियां भी वहां प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं।
हिंदी रंगमंच को विडम्बनापूर्ण स्थिति में पहुंचाने के लिए वे कलाकार भी कम दोषी नहीं हैं, जो हिंदी नाटकों का दाना-पानी खाकर मुम्बइया फिल्मों की सेवा में लग गए। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में पढ़ते हुए उन्होंने क़समे में तो नाटकों की सेवा की खाईं, लेकिन पांव सिनेमा के पखारने के लगे। इस समय अकेले मध्यप्रदेश के ही इतने रंगमंच कलाकार फ़िल्मों में ठीक-ठाक हैसियत रहते हैं कि वे चाहें तो एक साझा कोशिश से प्रदेश के रंगमंच में प्राण फूंक सकते हैं। रघुवीर यादव, आशुतोष राणा, गोविंद नामदेव, मुकेश तिवारी, विजयेन्द्र घाटगे, स्वानंद किरकिरे आदि कोशिश करें तो प्रदेश में रंगमंच नए करवट ले सकता है। यही भूमिका पूरे हिंदी क्षेत्र के लिए ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर, मनोज वाजपेयी, सुधीर मिश्रा और कुछ हद तक अमिताभ बच्चन भी निभा सकते हैं। स्वयं को पुनर्जीवित करने के लिए नाटक करने की बजाय इन्हें हिंदी रंगमंच को पुनर्जीवित करने के लिए सुदीर्घ योजना बनानी चाहिए। अगर ये लोग हिंदी नाटकों के लिए आगे आएंगे तो सरकारें भी जागेंगी और हिंदी नाटकों के दर्शकों के मन में जो हीन भावना है, वह भी ख़त्म होगी। सिनेमा के समानान्तर नाटकों का ग्लैमर तैयार होगा।
हिंदी में नाटकों के प्रति अगर उपेक्षाभाव ख़त्म नहीं होता, उनके प्रशिक्षण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती, हिंदी में रंगमंच से जुड़े नए प्रयोग करने वाले नाट्य लेखक तैयार नहीं होते, रंगमंच में रा़ेजगार की स्तरीय व्यवस्था नहीं होती, कलाकारों के साथ दर्शकों में भी व्यावसायिक भावना नहीं आती तो हिंदी रंगमंच असहाय और बेचारा दिखाई देता रहेगा। दिनभर के दीगर कामों के बाद शाम को फुरसत के क्षणों में जो रंगकर्म छोटे शहरों में किया जा रहा है, उससे भी अगर नाटकों की दुनिया रोशन है तो यह कम बड़ी बात नहीं है।
-ओम द्विवेदी