शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

थाली को भी चाहिए, शासन से अनुदान

रोटी बनकर खा गया, बेहतर कल को काल।
बड़ी भूख है कर रही, छोटी भूख हलाल।

प्रजा पुरानी कर रही, राजा को बदनाम।
उसे बदलकर मिलेगा, कुरसी पर आराम।

एक साथ दोनों गिरे, रुपया और चरित्र।
एक-दूसरे से हुए, दोनों खूब पवित्र।

छाछ बताता स्वयं को, कभी-कभी श्रीखंड।
बड़े मंच पर बड़ों का, दिखता है पाखंड।।

देख सियासी मनचले, लोकतंत्र हैरान।
जनता थाती दे किसे, जब सारे हैवान।

अब राजा के साथ है, जो थी कल तक रंक।
देख रसोई डर रही, सब्ज़ी का आतंक।

सब्ज़ी करने लग गई, सोने का सम्मान।
थाली को भी चाहिए, शासन से अनुदान।।

संसद से बढ़कर यहाँ, उसके पहरेदार।
सिंहासन पर बैठकर, करें नए व्यभिचार।

नई उमर को नया ही, पढ़ा रहे हैं पाठ।
जो जी-जी करते हुए, पार कर गए साठ।

किसका सुमिरन अब करूं, किसकी करूं तलाश।
कैसे जाऊं उस गली, जहां अनगिनत लाश।

दिल्ली-संसद में हुआ, गुपचुप कुछ अनुबंध।
टूट गया है गाँव से, बिलकुल ही संबंध।

जाने कैसा कर रहे, वैद्यराज उपचार।
उनकी सेहत बन रही, मैं क्रमशः बीमार।


-ओम द्विवेदी

बुधवार, 26 जून 2013

मावस ने अगवा किया, सूरज का परिवार

ताकतवर सरकार थी, चौकस पहरेदार।
मावस ने अगवा किया, सूरज का परिवार।।

मान रहे थे तुम्हे जो, सच में पालनहार।
लाशें उनकी बिछी हैं, आज तुम्हारे द्वार।।

लड़ता है संसार से, जो जीवनभर युद्ध।
अंत समय में वही फिर, बन जाता है बुद्ध।।

भले तोप गरजे कहीं, चले कहीं बंदूक।
अमराई में बैठकर, कोयल गाती कूक।।

सुख पर दावा सभी का, क्या घर क्या संसार।
नहीं मिला है आज तक, दुःख का हिस्सेदार।।

पहले अपने हाथ से, काटें अपने पैर।
फिर दुनिया से यह कहें, ख़ुदा न करता ख़ैर।।

ज़हर नदी में घोलकर, सागर को दी आह।
उसने बादल भेजकर, पल में किया तबाह।।

बादल चुकता कर रहे, इस धरती का क़र्ज़।
लेन-देन यह युगों का, हर पत्ते पर दर्ज़।।

बादल फिर गिरने लगे, फिर से रोया गाँव।
सड़ी-गली दीवार पर, खपरैले की छाँव।।

भोले-भले पिताजी, माफ़ करें अब आप।
बड़ी सफलता के लिए, बड़ा चाहिए बाप।।

कोई खाई की तरह, कोई दिखे पहाड़।
घिघियाता अक्सर मिला, जिसके पास दहाड़।।

-ओम द्विवेदी 

सोमवार, 24 जून 2013

इंदौर की अर्ज़ी : सांसें लौटा दो मेरे 'नाथ'

देश के तमाम शहरों की तरह मैं भी एक सांस लेता शहर इंदौर हूं...दूर देवभूमि में पहाड़ों पर अटके हुए हैं मेरे लाल, मेरे आंसू पलकों की कंदराओं में फंसे हुए हैं। उन्हें याद करके बादलों की तरह बार-बार फटती है मेरी छाती। कोई फोन बजता है तो पल भर के लिए निचुड़ जाता है शरीर से रक्त। लगता है गर्म पिघले शीशे की तरह कान में गिर न जाए अनहोनी से लथपथ कोई ख़बर। पहली बारिश लेकर अपने आसमान में आए मेघ जो कभी छंद की तरह लगते थे, आज नज़र आते हैं काल की मानिंद। लगता है ये यहीं बरस जाएं जो बरसना है, हिमालय की तरफ न करें अपना रुख़। मेरे जिगर के जो टुकड़े मेरे पास आने की जद्दोजहद कर रहे हैं, उन पर फिर बिजली बनकर न गिर पड़ें ये काले-काले काल। जिन लोगों को ज़िंदगी पाने के लिए मैने बाबा केदारनाथ के चरणों में भेजा था, उनकी मौत का हिसाब करना नहीं चाहता। जो जीवन देते हैं, उनसे लाशें लेना नहीं चाहता। जिनको भक्ति और आस्था का संस्कार दिया है, उनका अंतिम संस्कार करना नहीं चाहता।
भूगोल की जंज़ीरों से अगर जकड़े नहीं होते मेरे पैर तो अब तक मैं पहाड़ों से बिन लेता छूटे और छिटके हुए बेटों को, गोदी में उठाकर भर देता उनके जख्म। गंगा, यमुना और अलकनंदा में जाल डालकर छान लेता सैलाब में बही सांसों को। राजवाड़ा को कांधे पर रख पहुंच जाता 'नाथ के दरवाज़े पर और उसे स्थापित कर देता बही हुई धर्मशालाओं की जगह। छावनी मंडी को पीठ पर लादकर ले जाता और भर देता भूख का पेट। अगर नक्शे से चिपके होने का अभिशाप नहीं मिला होता तो छाती से चिपका लेता दर्द के मारों को, पी लेता उनके आंसू।
बाबा! मैं तुम्हारे धाम की तरह भले हज़ारों साल पुराना नहीं हूं, लेकिन मेरे सिरहाने विराजे हैं दो-दो ज्योतिर्लिंग। उनकी परिक्रमा करवाता हूं मैं भी। देश-दुनिया से आए अतिथियों की बलि लेने की अनुमति न मैं बादलों को देता और न हवाओं को। हमारे महाकाल मुर्दे की राख लेते हैं, ज़िंदा को मुर्दा नहीं करते। ओंकार पर्वत पर बैठे ओंकारेश्वर डांटते रहते हैं नर्मदा को कि वह घाट पर नहाते भक्तों को अपने आगोश में न ले। पिघलने वाले पहाड़ पर बैठकर भी आपका दिल नहीं पिघला। आप बैठै रहे और आपके चाहने वाले बहते रहे। आपके जयकारे लगाते-लगाते वे शून्य में खो गए। मेरे आंगन में देवी अहिल्या ने शिव भक्ति की जो ज्योति जलाई थी, वह तूफानों में घिर गई है। बचाओ उसकी लाज।
मेरे भी सीने में धड़कता है दिल। मैं भी सुबह सूरज को न्योता देता हूं रोशनी के लिए और शाम को देहरी पर रख देता हूं उम्मीद का दीया। अगर आपको सुनाई देती है आंसुओं की प्रार्थना तो सही सलामत लौटाओ मेरी संतानों को। अगर चाहते हो कि हमारी आस्थाओं की उम्र लंबी हो तो किसी को अनाथ मत करो मेरे 'नाथ....सबको सुरक्षित लौटाओ मेरे धाम, जिससे दोबारा भेज सकूं चारोधाम।
-ओम द्विवेदी
(२४ जून को नईदुनिया में प्रकाशित टिप्पणी)

शनिवार, 15 जून 2013

दोहे : घर तक आती नौकरी, दफ्तर तक घर रोज़

ऊँची कुर्सी पर यहाँ, दिखते छोटे लोग।
ऊँचे-ऊँचे काम का, करते रहते ढोंग।।

छोटी-छोटी कुर्सियां, देती हैं बलिदान।
तब ऊँची को जगत में, मिलता है सम्मान।।

एक साल के बाद फिर, मालिक हुआ प्रसन्न।
बड़े शान से बांटता, चुटकी भरकर अन्न।।

मालिक चक्की की तरह, दाना है मज़दूर।
स्वाद बढ़ाने के लिए, पीसे है भरपूर।।

हाथी घूमे शहर में, वन में मोटर-कार।
दिखता दोनों ओर है, जमकर हाहाकार।।

पति अपने इस राष्ट्र के, आये थे इंदौर।
दंपति सारे शहर के, ढूढ रहे थे ठौर।।

लपक-गरजकर आ गई, मेघों की बारात।
घर के बाहर देखिए, हैं कैसे हालात।।

तेज़ तपिश के बाद अब, बूंदों का त्यौहार।
पेड़ मांगने लग गए, बादल से अधिकार।।

घर तक आती नौकरी. दफ्तर तक घर रोज़। 
एक - दूसरे में करें, दोनों अपनी खोज।।

पानी बरसे रातभर, दिन में बरसे आग।
धरती छेड़े किस तरह, अपना जीवन राग।।

शब्द-शब्द तलवार है, शब्द-शब्द बाज़ार।
कैसे- कैसे रूप में, सजता है अखबार।।

क्रिकेट जिसे हम मानते, नए समय का धर्म।
साथ उसी के हो रहा, सामूहिक दुष्कर्म।।

नदी हमारे गाँव की, जब तक पानीदार।
जीवन के जनतंत्र में, साँसों की सरकार।।

धुआं अगर देने लगा, इस जीवन को स्वाद।
फिर काया का राख में, होना है अनुवाद।।

कुदरत की चौपाल पर, जीवन का सत्संग।
जन्मे जिस भी कोख से, बचपन मस्त मलंग।।

यहाँ ज़िंदगी हर क़दम, खोले नए किवाड़।
देख जड़ों की जिजीविषा, टूटे कई पहाड़।

सूरज देखो कर रहा, कैसा नंगा नाच।
घर के भीतर आ रही, भट्टी जैसी आंच।।

सबका अपना रास्ता, सबकी अपनी रेल।
प्लेटफार्म पर ही करो, थोड़ा-थोड़ा मेल।।


-ओम द्विवेदी 

रविवार, 12 मई 2013

मां ने रखा सहेजकर, सबको बिलकुल पास


भाड़े-बर्तन कर रहे, आपस में तकरार।
मां रहती है देखकर, अक्सर ही बीमार।।

कभी गली में झांकती, कभी रही है खांस।
बेटा घर से दूर है, मां की अटकी सांस।।

भाई दिखलाने लगे, जबसे अपनी पीठ।
एक-एककर हो गए, दुश्मन सारे ढीठ।।

मां ने रखा सहेजकर, सबको बिलकुल पास।
दो शब्दों को जिस तरह, जोड़े रखे समास।।

एक कोख के ख़ून में, घुले अगर तकरार।
नागफनी बनने लगे, आंगन की दीवार।।

मौला ने आदम दिया, आदम ने संसार।
मां ने मौला को दिया, एक बोसे में प्यार।।

बेटे ने जब-जब किया, छाती से संवाद।
मां तब-तब करती मिली, ममता का अनुवाद।।

दिखें भिखारी देवता, रंक दिखे सरकार।
जब माथे को चूमकर, माता बांटे प्यार।।

आंचल अंबर के सदृश, हृदय धरा का रूप।
सागर जैसा प्यार है, लोरी ठंड की धूप।।

सूरज चढ़े मुडेर पर, गरमी हो उद्दंड।
बनी बरफ की डली मां, घुल-घुल बांटे ठंड।।

जब बेटों को कष्ट दे, जग की कोई चीज़।
मां धागे में बांधती, ममता का ताबीज़।।

मां देहरी पर बैठकर, उमर रही है काट।
लड़कर बेटों ने किया, जबसे हिस्सा-बांट।।


  • ओम द्विवेदी 

ताना मारे ज़िंदगी से.... 

शनिवार, 23 मार्च 2013

माफ़ करना भगतसिंह


मैं भी उठा सकता हूँ बम
लेकिन साहस नहीं है कलेजे में
मैं भी बोल सकता हूँ इन्कलाब जिंदाबाद
लेकिन कांप जाती है ज़बान

नौजवानी मेरे पास भी है

लेकिन उसके सपने में है केवल नौकरी और छोकरी
आज़ाद नहीं है मेरा भी देश
लेकिन आजादी की इच्छा मर गई है मेरे भीतर

मुझे भी वतन के लिए बुलाता है फांसी का फंदा
लेकिन रह-रहकर आता है बीवी और बच्चों का ख्याल
मै कैसे कहूँ भगतसिंह
कि मैं तुम्हारी तरह जीना चाहता हूँ
रात के ख़िलाफ़
एक दीया बनना चाहता हूँ

कैसे कहूँ तुमसे कि नहीं लड़ पा रहा हूँ
भीतर बैठे एक नपुंसक से
दीमकों से नहीं बचा पा रहा हूँ अपनी आत्मा को

मुझे माफ़ करना भगतसिंह
मैं नहीं रख पाया तुम्हारे बलिदान की लाज.

-ओम द्विवेदी

वीडियो देखने का पता
  

गुरुवार, 7 मार्च 2013

आइए बधाइयाँ दें उसे



पहले उसके साथ बलात्कार करो
फिर उसे कहो निर्भया और बहादुर
पहले उसे दासी बनाओ
फिर कहो देवी
पहले कुचलो उसके सपनों को
फिर बताओ सपनों से सुन्दर
तीन सौ चौंसठ दिन जिसे मनुष्य कहने में
कांपती रही हमारी जीभ
आइए बधाइयाँ दें उसे।
  • ओम द्विवेदी  

पहले उसके साथ बलात्कार करो 
फिर उसे कहो निर्भया और बहादुर 
पहले उसे दासी बनाओ 
फिर कहो देवी 
पहले कुचलो उसके सपनों को 
फिर बताओ सपनों से सुन्दर 
तीन सौ चौंसठ दिन जिसे मनुष्य कहने में
 कांपती रही हमारी जीभ 
आइए बधाइयाँ दें उसे।

सोमवार, 28 जनवरी 2013

तेरी मीनार तेरा गुम्बद देख लिया

तेरी मीनार तेरा गुम्बद  देख लिया। 
तेरी पूजा, अज़ान, सबद देख लिया। 

उठा के एड़ी न ऊंचाई का अहसास करा 
तेरी बातों से तेरा कद  देख लिया।

तेरी ताक़त का बहुत शोर था लेकिन,
तुझे भीड़ में तन्हा अदद  देख लिया।

तेरा बाज़ार जिस दुनिया को गांव कहता है,
वहां देहरी-देहरी पे सरहद  देख लिया।

जिसे मिलती है मुफ़लिस की बद्दुआ हरदम,
वो कुर्सी, वो ऊंचा पद  देख लिया।

  • ओम द्विवेदी 
(ताना मारे ज़िंदगी से )

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

तू अपनी बात के पीछे, ये सर जाने से डरता है

ये जो काम करना है, वो कर जाने से डरता है।
तू अपनी बात के पीछे, ये सर जाने से डरता है।

सड़क के बीच ट्रैफिक में फंसा कमज़ोर एक बूढ़ा
इधर आने से डरता है, उधर जाने से डरता है।

तू कांटा है तो तेरा फ़र्ज़ है गुलशन की रखवाली
अगर तू फूल है तो क्यों बिखर जाने से डरता है।

बदन के घाव दिखलाकर जो अपने पेट भरता है
सुना है वो भिखारी ज़ख़्म भर जाने से डरता है।

मै शिक्षक हूँ मुझे मालूम है तुम भी समझ लेना
जो बच्चा घर से भागा है, वो घर जाने से डरता है।

तवायफ़ के बुढ़ापे सी है तेरी ज़िन्दगी बैजू
मरने के लिए तैयार बैठा है, मर जाने से डरता है।


  •  बैजू कानूनगो 


(बैजू मेरे प्रिय कवि हैं। उनका कोई कविता संग्रह अभी तक नहीं आया है। शायद किसी प्रकाशक का दिल-गुर्दा इतना मज़बूत नहीं कि उन्हें छापे। वे लोगों के दिलों में राज करते हैं। ग्वालियर से अगर तानसेन ने हिंदुस्तान को संगीत दिया है तो बैजू ने कविताई दी है।)

शनिवार, 5 मई 2012

हंसी की शोक कथा


हंसने के लिए तैयार बैठा हूं, लेकिन हंसी है कि ही नहीं रही। दस-बीस चुटकुले पढ़ लिए, पेट में गुदगुदी कर ली, नेताओं के चेहरे देख लिए, खट्टी चटनी के साथ मिठाई खा ली, बिना बात पत्नी की तारीफ कर दी, मूर्ख अफसर को महापंडित कह दिया...फिर भी नहीं रही। आतंकियों की तरह नामुराद शरीर के जाने किस कोने में छिपी बैठी है। कहीं नक्सलियों ने इसे अगवा तो नहीं कर लिया, हम ताके बैठे रहें और उधर से चिठ्ठी जाए कि पहले हमारी हंसी रिहा करो, तब हम तुम्हारी करेंगे।

अपनी हंसी की तरह ही राजनीतिक दलों के लोग इस समय राष्ट्रपति का उम्मीदवार खोज रहे हैं। कोई अपने घर में ढूंढ रहा है तो कोई दूसरे के घर में। चप्पे-चप्पे में छापेमारी हो रही है, लेकिन उम्मीदवार लापता। आम सहमति का लतीफा सुनकर भी बाहर नहीं रहा। १२१ करोड़ की आबादी में वह जाने कहां छिपा है। मैं डरा बैठा हूं कि लोग कहीं मुझे पकड़ लें। पति होने के नाते राष्ट्रपति के उम्मीदवार की पात्रता तो मेरे पास भी है। अगर बना दिया तो फिर हंसी का क्या होगा? कैसे आएगी? वैसे इस उम्मीदवारी से अपने बचने की उम्मीद इसलिए है कि कमर धनुष नहीं बनी है और पांव कब्र में नहीं लटके हैं। सुबह-शाम विदेश टहलने के लिए वीजा-पासपोर्ट भी नहीं बना है। उम्मीदवार खोजने वाले भारतीय संस्कृति के होम गार्ड जवान भी हैं, वे जानते हैं कि अपन जैसे नौजवान टाइप के लोग अगर धोखे से उस आसन तक पहुंच गए तो सुख-सुविधा देखकर पगला जाएंगे और अमेरिका के क्लिंटन बाबू की तरह चुपके-चुपके आईपीएल खेलने लगेंगे। कुछ अपने पुरखों ने भी बचा लिया। उच्च कुल गोत्र देकर, ऊंची सियासत के लिए अछूत कर दिया।
जैसे चुनाव के समय नेताजी राजधानी से बाहर निकलने का मन करते हैं, अपनी हंसी भी कभी-कभार बाहर आने के लिए कुलबुलाती है। पुलिस के डंडों और सीबीआई की यातना के डर से जैसे विपक्ष वाले इंकलाबी मुठ्ठियां आहिस्ता से कुरते की जेब में डाल लेते हैं, हंसी भी अंतःपुर में प्रवेश कर जाती है। वह युवतियों की तरह डरती रहती है कि बाहर निकले और मनचले उसे छेड़ने लगें। उठाकर ले जाएं और सामूहिक दुष्कृत्य कर डालें। हंसी को याद है कि एक बार कौरवों को देखकर वह द्रोपदी के अंदर से फूट पड़ी थी। इसके बाद से पूरे हस्तिनापुर से उसका नामो-निशान मिट गया था। राम को राज सौंपने की बात पर दशरथ हंसे ही थे कि फिर बचे नहीं। राम जंगल और वे स्वर्गलोक। हंसी सोचती होगी कि यह आम आदमी जिंदा रहे इसलिए वह इस हाड़-मांस के पिंजरे में अपने को कैद किए हुए है। वह बालिका भ्रूण की तरह गर्भ में ही मर जाना चाहती है।

सच बताऊं हंसी ने सत्याग्रह कर दिया है। बाहर महंगाई खंजर लिए घूम रही है। सब्जी, रोटी, चावल, दाल सभी इस तरह मुंह फाड़े खड़े हैं कि आदमी को ही कौर बनाकर खा जाएं। खरीदने की जरूरत ही नहीं, भाव सुनकर ही लोगों की ह्दयगति रुकती है। ऊंट के मुंह में जीरा फिर भी बड़ा लगता है। महंगाई के मुंह में तनख्वाह की स्थिति तो उससे भी गई गुजरी है। भ्रष्टाचार इतना अधिक है कि छापा मारने वाले छापा नहीं मार पा रहे हैं, जुल्म इतना अधिक कि पुलिस कम पड़ रही है, न्याय देते-देते अदालतें थकी जा रही हैं और फाइलें घटने का नाम नहीं ले रहीं। हंसी बाहर आकर करेगी भी क्या? आएगी भी तो कितने दिन बाहर रह पाएगी? इसलिए उसने फैसला किया है कि जब तक बाहर का माहौल उसके लायक नहीं हो जाता वह अंदर ही रहेगी और जन-जन के लिए अनशन करेगी।

अपनी हंसी दुलहन की तरह सोलह श्रृंगार कर रही है, जब निकलेगी तो लोग ठगे रह जाएंगे। वह जनता के गुस्से की तरह अंदर बैठी खून का घूंट पी रही है, जिस दिन बाहर आएगी सरकारें खून के आंसू रोएंगी। वह बीज की तरह धरती के भीतर पक रही है, जिस दिन दिन निकलेगी धरती का सीना फोड़कर निकलेगी। वह मुखौटे की तरह होठों पर चस्पा नहीं होगी, बल्कि इस तरह करेगी अट्टहास कि आंसुओं का कलेजा दहल जाएगा।
  • ओम द्विवेदी