गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

अण्णा के नाम प्रेमपत्र

...कि तुम नाराज मत होना


आदरणीय,

देशवासियों के साथ मैं भी कुछ दिन पहले ही आपके आंदोलन से फारिग हुआ हूँ । नारों से गला, मोमबत्तियों से हाथ और टोपी से सिर ख़ाली हुआ है। सीना ताने घूम रहा हूँ कि मैने सरकार को कदमों में झुका लिया है। सच पूछिये मैं दो कौड़ी का आदमी अरबों-खरबों की सरकार को चुटकी में मसलकर बहुत ख़ुश हूँराजधानियाँ और शहर क्रांति से अटे पड़े हैं। ऐसा लग रहा है जैसे जगह-जगह इंक़लाब की गुमटियाँ लग गई हों, आपकी सरकार बन गई हो, आज़ादी नामक किताब का दूसरा संस्करण हाथ लग गया हो। में अगर मैं न ख़ुश होता तो पड़ोसी मुझे सूमड़ा बोलते, ज्ञानी लोग अज्ञानी और देशप्रेमी मुझे देशद्रोही समझते। सामाजिक प्राणी होने के नाते इतने इल्ज़ाम झेलकर गुज़र-बशर करना नामुकिन था, अस्तु मैंने ख़ुश होने की परंपरा का निर्वाह किया।

आज आप देश के सबसे बड़े नायक हैं, आपने जंतर-मंतर में बैठकर मारण मंत्र सिद्घ किया है और उसे सरकार तथा भ्रष्टाचार पर एक साथ फेंका है। सरकार तिलमिलाने का टेलीफ़िल्म दिखा रही है, वह कराहों और विनम्रता के अलंकारों से सज गई है। ऐसे में आपसे सवाल पूछना महापातक जैसा लगता है। जैसे सवाल पूछकर मैं अपनी ही हत्या कर रहा हूँ , लेकिन क्या करूँ रहा नहीं जा रहा है। जिस तरह आप ६०-६२ साल से भ्रष्टाचारियों को क्षमा करते आए हैं, एक बार इस बालक को भी माफ करिएगा। सच बताऊँ अण्णा! ये सवाल भी मेरे नहीं हैं, बल्कि ये वह खुसुर-फुसुर है, जो मेरे आसपास चलती रहती है और जिसका जवाब देने के लिए मैं आपकी तरफ टकटकी लगाए देख रहा हूँ

सारा देश आपको दूसरा गाँधी कह रहा है, लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आप कौन से दूसरे गाँधी हैं। एक अब्दुल गफ़्फार गाँधी थे, वे भी दूसरे वाले ही थे। इसके बाद इंदिरा-फिरोज गाँधी से लेकर राहुल और वरुण गाँधियों तक में दूसरा गाँधी बनने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। चलिए आपको उपवास करने वाला और अहिंसा धरने वाला दूसरा गाँधी मान लेते हैं, फिर आपने भ्रष्टाचारियों को फाँसी देने वाली बात जो कही है, उसका क्या करें! क्या फाँसी भी अहिंसात्मक हो सकती है। बेचारे पहले गाँधी ने फाँसी देने की बात तो अंगरेज़ों के लिए भी नहीं कही। वे उनसे जीवनभर देश छोड़ने की विनती करते रहे। आज के काले क्या उनसे बड़े अंगरेज़ हैं या आप सत्याग्रह की प्रयोगशाला में कोई नया प्रयोग कर रहे हैं? आपने सुभाषचंद्र बोस की तरह लाल किले पर धावा बोलने की घोषणा भी कर दी।मुझ अज्ञानी को स्पष्ट करें कि क्या लाल किला भ्रष्टाचारियों का गढ़ है, जिस पर चढ़ाई करके आप देश को भ्रष्टाचार की ग़ुलामी से आज़ाद कर देंगे। क्या आपका आंदोलन गाँधी और भगतसिंह का कॉकटेल है। दोनों के मिश्रण से किसी नई क्रांति का कारखाना लगा रहे हैं क्या...?

हजारे साहब! देखते ही देखते आपके साथ लाखों लोग खड़े हो गए। दिन में रैलियों और रात में मोमबत्तियों की भीड़ लग गई।गाँधीजी ने चरखा चलाकर खादी का उद्घार किया था, आप चाहें तो मोमबत्ती का भला हो सकता है।खादी की तरह मोमबत्ती को आज़ादी की दूसरी लड़ाई का प्रतीक बना सकते हैं। वैसे भी जिस तरह से बिजली संकट बढ़ रहा है, आने वाले दिनों में ईमानदार मनुष्यों से ज़्यादा मोमबत्तियों की ज़रूरत पड़ेगी। एक बात चुपके से बताइगा कि आप अपने आंदोलन के लिए इतनी सुंदर और समझदार जनता कहाँ से लेकर आए थे। स्त्रियाँ मेनका और रंभा की तरह सुंदर थीं तो पुरुष कामदेव के अवतार। ऐसा लग रहा था कि आपका आंदोलन किसी स्वर्ग लोक में चल रहा है। टीवी पर ऐसे चेहरे देखकर न जाने कितनों का मन आंदोलन के लिए डोला होगा। लोगों को भले ये आईपीएल की तरह आंदोलन की चियर गर्ल लगें, लेकिन मुझे तो ये भ्रष्टाचार से तंग जनता लग रही थी, और बार-बार इस जनता का साथ देने का मन कर रहा था।

एक बात और आपके आंदोलन में पचास-साठ लाख रुपए जो खर्च हुए वह तो ईमानदारी के थे न! वह तो इधर-उधर के रास्तों से नहीं आया था। किसी भ्रष्ट ने तो दान नहीं दिया था न! आपने अपनी सारी जमीन गाँव के विकास के लिए दे दी। आपकी सेना के सेनापति भूषण द्वय खरबपति हैं, उन्होंने आंदोलन के लिए कुछ दान किया कि नहीं!

अण्णा साहब! कभी-कभी आप गाँधी से भी बड़े लगते हैं। बेचारे गाँधीजी बीस-पच्चीस साल तक संघर्ष करते रहे, फिर भी उन्हें इतनी लुभावनी जनता नहीं मिली। ऐसा कभी नहीं हुआ कि उनके आंदोलन से आंदोलनकारी भी खुश रहें और सरकार भी।आंदोलनकारी अपनी पीठ ठोंके और सरकार अपनी। आंदोलनकारी कहें कि जनता जीती और सरकार कहे कि लोकतंत्र। वे वर्षों संघर्ष करने के बाद भी संघर्ष का जश्न नहीं मना पाए। आप अपना कमाल देखिए कि पाँच दिन में ही आपने संघर्ष को उत्सव में बदल दिया। कहने वाले भले गाँधी को महान कहें, लेकिन अपुन तो नहीं कहने वाले। गाँधीजी ने जनता को सत्य-अहिंसा और ईमानदारी का पाठ पढ़ाकर उसे नाहक तंग किया।वे आज होते तो जनता को ही कहते कि जब आप रिश्वत नहीं दोगे तो लेने वाला कैसे लेगा। आपने कम से कम हमारा ख़्याल रखा और रिश्वत लेने वालों का ही कान ऐंठा कि जब तुम लोगे नहीं तो देने वाला देगा कैसे...?

धोनी की कप्तानी और सचिन के बल्ले की तरह आपका आंदोलन चल निकला है। मल्टीनेशनल कंपनियाँ आपकी तरफ आँखें फाड़े देख रही हैं। अपने उत्पाद के लिए आपको बेचना चाहती हैं। ईमानदार लोगों को भी ठंडा और गरम पीना पड़ता है। उन्हें लुभाने के लिए ईमानदार आदमी का ही विज्ञापन करना ज़रूरी है। अगर आप थोड़ा उस दिशा में सोचें तो आपके आंदोलन का ख़र्च भी निकल आएगा और मीडिया फ्रेंडली बने रहेंगे। राजनीतिक दल के लोग भी एक ऐसे प्रधानमंत्री की तलाश में हैं, जो ख़ुद ईमानदार हो और जिसकी आड़ में बेईमानी का कारोबार चलाया जा सके। इस तरह आपकी क्रांति ने बहुत सारे बंद दरवाज़े खोले हैं। गाँधीवाद में नए बाज़ार का दर्शन हुआ है। जो लोग वोट डालकर सरकार बदलने नहीं निकलते वे मोमबत्ती लेकर राजधानी में आग लगाने निकले हैं। मैं भी आपके साथ चार-पाँच दिनों तक इसीलिए लगा रहा ताकि बेइमानी पर ईमानदारी की बढ़िया पैकिंग चढ़ जाए, लोग मुझे भ्रष्ट करने में स्वयं को धन्य समझें और भ्रष्ट कहने में घबराएँ।

आपका ही
एक अनुयायी


-ओम द्विवेदी
( छवि गूगल से साभार )

रविवार, 27 मार्च 2011

हिंदी रंगकर्म की विडम्बनाएं

आज विश्व रंगमंच दिवस है, याद आया कि कभी अपने भीतर भी कलाकार हुआ करता था, कभी अपने सपने में भी नाटकों के किरदार चला करते थे, कभी राते रिहर्सल में कटती थीं और सभागार में बजने वाली तालियां महीनों ऊर्जावान रहने की प्रेरणा देती थीं। उन्हीं दिनों को याद करके ही थोड़ा-सा सोचा और थोड़ा-सा लिखा। शायद लिख-लिखकर ही फिर से जाग जाएं। -ब्लागर

हिंदी सिनेमा जितना समृद्घ है, हिंदी रंगमंच उतना ही विपन्न। फ़िल्म अभिनेता जितने मालामाल हैं, रंगमंच के कलाकार उतने ही कंगाल। आज़ादी के साठ साल बाद भी न तो उनके लिए कोई सरकारी योजना है और न ही उनके भरण पोषण के लिए कोई इंतज़ाम। परिणाम यह कि हिंदी रंगमंच की ओर रुख करने में भी युवाओं के पांव कंपकंपाते हैं। अगर वे हिंदी नाटकों की दुनिया में दाख़िल होते भी हैं तो इसलिए कि उन्हें देर-सबेर बॉलीवुड का टिकट चाहिए होता है। रंगममंच के लिए बड़े-बड़े कलाकारों का समर्पण अंततः पेट के आगे आत्म समर्पण कर देता है। परिणाम यह कि हिंदी रंगकर्म आज भी शौक़िया है और ज़्यादातर शौक़िया रंगकर्मियों के हाथ में ज़िंदा भी है।

वह निकट भविष्य में पूरी तरह व्यावसायिक हो पाएगा, इसमें संदेह है। इसके पीछे तर्कों की लंबी फ़ेहरिस्त है। नाटकों के लिए हर तरफ उपेक्षा भाव है। ज़्यादातर उत्तर भारत के पारिवारिक संस्कारों में रंगकर्मियों को आज भी 'भाड़' ही माना जाता है। जिनमें सीखने की जिज्ञासा है और जो रंगमंच को जीवन की मुख्यधारा में शामिल करना चाहते हैं, उनके लिए बेहतर प्रशिक्षण नहीं है। राष्ट्रीय नाट्‌य विद्याल नई दिल्ली और भारतेंदु नाट्‌य अकादमी लखनऊ को छोड़ दिया जाए तो कोई भी सरकारी संस्थान ऐसा नहीं है, जहां रंग प्रतिभा को निखारा और संवारा जाता हो। यहां भी इतनी कम सीटें हैं कि हज़ारों युवक वहां पहुंचने का ख़्वाब ही देखते रह जाते हैं। भोपाल का भारत भवन अब केवल प्रेक्षागृह ही रह गया है। जब तक ऐसे संस्थानों का विकेन्द्रीकरण नहीं होगा, तब तक छोटी-छोटी जगहों पर रंग रुचियों का अंकुर छायादार वृक्ष नहीं बनेगा।

नाटकों को मंच पर उतारने के लिए पहली ज़रूरत स्क्रिप्ट की होती है। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अच्छे हिंदी नाटक ऊंगलियों पर गिने जाने लायक़ हैं और उन्हें कई-कई बार मंचित किया जा चुका है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जयशंकर प्रसाद, मोहन राकेश जैसे कुछेक नाटककारों ने मौलिक नाट्‌य लेखन की शुरुआत की, लेकिन यह परंपरा समृद्घ होकर आगे नहीं बढ़ी। मराठी, बंगाली आदि अन्य भारतीय भाषाओं सहित विदेशी भाषाओं के अनुदित नाटकों के ज़रिए हिंदी रंगमंच संघर्ष अवश्य करता रहा है, लेकिन अपनी जड़ों से पानी लेकर वृक्ष के बड़े होने का संतोष ही कुछ और है। जो नाटककार लोक से जुड़कर आगे बढ़े, उनके यहां यह आनंद स्पष्ट दिखाई देता है। हबीब तनवीर का नया थियेटर इसका उदाहरण है। हबीबजी ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के नितांत गंवई कलाकारों के साथ मिलकर हिंदी थियेटर को सात समंदर पार तक स्थापित किया। रंग विदूषक के जरिए बंसी कौल ने भी नाटकों में एक नई स्थापना दी। इन दोनों ने अभिनेताओं की अभिनय क्षमता के हिसाब से स्क्रिप्ट भी लिखी। भोपाल में अलखनंदन भी यह काम निरंतर कर रहे हैं। लखनऊ में जावेद अख्तर, गया में संजय सहाय, जबलपुर में अरुण पांडेय, दिल्ली में अरविंद गौड़ नाट्‌य लेखन के साथ उनके मंचन में संलग्न हैं, लेकिन यह कोशिश इतनी पर्याप्त नहीं कि हिंदी रंगमंच में क्रांतिकारी परिवर्तन हो सके। इनके कामों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिभाशाली युवा रंगकर्मी भी नहीं दिख रहे।

उपेक्षा का आलम यह है कि हिंदी क्षेत्र में एक शहर में एक सभागार भी ऐसा नहीं है जो विशुद्घ रूप से नाट्‌यकर्म के लिए हो। जो सभागार थोड़े से साधन संपन्न हैं, उनकी स्थिति इंदौर के रवीन्द्र नाट्‌य गृह की तरह है। उनका एक दिन का किराया ही इतना महंगा है कि कलाकार बिक जाए।शादी-बारात और सरकारी बैठकों के लिए बने सभागारों में ही जुगाड़कर रंगकर्मी नाटक करते हैं। इससे प्रस्तुति में वह प्रभाव पैदा नहीं होता जो व्यावसायिक रंगकर्म में झलकता है। दिल्ली में हिंदी रंगकर्म इसलिए भी केंद्रित है क्योंकि वहां एनएसडी के भारी-भरकम ख़र्चे पर नाटक होते हैं और तमाम नाट्‌य समारोहों में अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा विदेशी भाषाओं के नाटकों की भव्यता और दिव्यता दिखाई देती है। प्रेक्षागृह से लेकर रंगमंच की तमाम अन्य सहायक सामग्रियां भी वहां प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं।

हिंदी रंगमंच को विडम्बनापूर्ण स्थिति में पहुंचाने के लिए वे कलाकार भी कम दोषी नहीं हैं, जो हिंदी नाटकों का दाना-पानी खाकर मुम्बइया फिल्मों की सेवा में लग गए। राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय में पढ़ते हुए उन्होंने क़समे में तो नाटकों की सेवा की खाईं, लेकिन पांव सिनेमा के पखारने के लगे। इस समय अकेले मध्यप्रदेश के ही इतने रंगमंच कलाकार फ़िल्मों में ठीक-ठाक हैसियत रहते हैं कि वे चाहें तो एक साझा कोशिश से प्रदेश के रंगमंच में प्राण फूंक सकते हैं। रघुवीर यादव, आशुतोष राणा, गोविंद नामदेव, मुकेश तिवारी, विजयेन्द्र घाटगे, स्वानंद किरकिरे आदि कोशिश करें तो प्रदेश में रंगमंच नए करवट ले सकता है। यही भूमिका पूरे हिंदी क्षेत्र के लिए ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर, मनोज वाजपेयी, सुधीर मिश्रा और कुछ हद तक अमिताभ बच्चन भी निभा सकते हैं। स्वयं को पुनर्जीवित करने के लिए नाटक करने की बजाय इन्हें हिंदी रंगमंच को पुनर्जीवित करने के लिए सुदीर्घ योजना बनानी चाहिए। अगर ये लोग हिंदी नाटकों के लिए आगे आएंगे तो सरकारें भी जागेंगी और हिंदी नाटकों के दर्शकों के मन में जो हीन भावना है, वह भी ख़त्म होगी। सिनेमा के समानान्तर नाटकों का ग्लैमर तैयार होगा।

हिंदी में नाटकों के प्रति अगर उपेक्षाभाव ख़त्म नहीं होता, उनके प्रशिक्षण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती, हिंदी में रंगमंच से जुड़े नए प्रयोग करने वाले नाट्‌य लेखक तैयार नहीं होते, रंगमंच में रा़ेजगार की स्तरीय व्यवस्था नहीं होती, कलाकारों के साथ दर्शकों में भी व्यावसायिक भावना नहीं आती तो हिंदी रंगमंच असहाय और बेचारा दिखाई देता रहेगा। दिनभर के दीगर कामों के बाद शाम को फुरसत के क्षणों में जो रंगकर्म छोटे शहरों में किया जा रहा है, उससे भी अगर नाटकों की दुनिया रोशन है तो यह कम बड़ी बात नहीं है।
-ओम द्विवेदी

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

कहानियाँ गुमसुम, कविताएँ उदास

२५ मार्च को सुबह-सुबह युवा कवि और कहानीकार शशिभूषण का मोबाइल पर संदेश आया कि-'' हम सबके कमला प्रसादजी सुबह ६ बजे नहीं रहे।'' कुछ देर बाद यही संदेश युवा कवि हनुमंत के मोबाइल से आया। दोपहर में योगेन्द्र ने कमलाजी के बारे में पूछा। कुछ सूझ नहीं रहा था कि किसी को क्या उत्तर दूँ और उनके बारे में क्या बात करूँ । एकलव्य की ही तरह तकरीबन १८ वर्ष तक मैं उनका शिष्य रहा। तथाकथित अर्जुनों और युधिष्ठिरों ने नहीं चाहा, वरना मैं भी अंतिम समय में उनसे मिल सकता था। जब तक उनकी बीमारी के बारे में पता चलता तब तक वे कोमा में एम्स पहुँच चुके थे। खैर! उनके आशीर्वाद ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है। करता रहेगा। -ब्लागर


कविताओं की आँखों से आंसुओं का सोता फूट पड़ा हैं, कहानियाँ गुमसुम-सी हैं, उपन्यास उदास। शब्द थके-हारे से, जैसे किसी ने उनसे अर्थ निचोड़ लिया हो।...जैसे उनका रहनुमा चला गया हो। 'वसुधा' बेहाल है। कवियों और लेखकों की जमात स्तब्ध और हैरान। हरिशंकर परसाई का 'कमांडर', उन्हीं के पास पहुँच गया है। आलोचना का एक अध्याय ख़त्म हो गया है। ज़िंदगी के बेहद मज़बूत क़िले में मौत की काली बिल्ली कूद पड़ी है। व्यवस्था के कैंसर का इलाज करते-करते एक सुखेन वैद्य काया के कैंसर से हार गया है। कमला प्रसाद नाम के फ़ौलाद को मृत्यु ने तोड़ दिया है। अब किसी भी साहित्यिक आयोजन में उनकी ऊर्जावान उपस्थिति देखने को नहीं मिलेगी। अब नए लेखकों को कविताएँ और कहानियाँ लिखने का हुनर कौन बताएगा। रचना शिविर के लिए क़स्बों-क़स्बों और शहरों-शहरों कौन दौड़ा-दौड़ा जाएगा। अब दोस्त किसे इज्ज़त देंगे, दुश्मन किसे गालियाँ देंगे। अब कौन तपाक से फोन उठाएगा और पूछेगा कि आजकल क्या लिख-पढ़ रहे हो। कौन बार-बार समझाएगा कि अच्छा लेखक होने के लिए अच्छा इंसान होना ज़रूरी है। कौन कहेगा कि पार्टनर अपनी प्रतिबद्घता तय करो। प्रगतिशील लेखक संघ को संजीवनी देने के लिए कौन अपना रात-दिन एक करेगा। कमांडर! अभी तो तुम्हारे सिपाहियों ने युद्घ का ककहरा भी नहीं सीखा था और तुम मोर्चा छोड़कर चल दिए।

मेरे जैसे बहुतेरे लोगों ने उन्हें जब भी देखा चलते देखा, उनके बारे में जब भी सुना चलते सुना। कभी किसी आयोजन के लिए तो कभी किसी संघर्ष के लिए। न उनकी चाल में दिखावट और थकावट दिखी न उनके हाल में। विश्वविद्यालय और कला परिषद जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर सरकारी फ़ाइलों के बीच रहे, लेकिन उनका व्यक्तित्व फ़ाइलों का ग़ुलाम नहीं हुआ, उनमें नत्थी नहीं हुआ। उनके पास से जो फ़ाइलें आईं वे रचनात्मकता की कोख बन गईं और उन्होंने किसी जनपक्षधर आयोजन को जन्म दिया। नब्बे के दशक में वे रीवा विश्वविद्यालय में हिंदी के विभागाध्यक्ष थे। जब मेरा उनसे परिचय हुआ तब वे केशव शोध अनुसंधान केंद्र को ओरछा जाने से रोकने के लिए एक-एक रुपए का चंदा कर रहे थे और अदालत की लड़ाई लड़ रहे थे। कालांतर में वे उस लड़ाई में आधा ही सही सफल हुए। उनकी उपस्थिति से रीवा विवि हिंदी प्रेमियों की चौपाल बन गया। हर हफ्ते किसी नामचीन साहित्यकार से मिलने और उन्हें सुनने का मौका मिलने लगा। रशियन विभाग में भीष्म साहनी का व्याख्यान चल रहा है तो हिंदी विभाग में काशीनाथ सिंह छात्रों से रूबरू हो रहे हैं। नागार्जुन और त्रिलोचन अपनी कविताई पर बोल रहे हैं, राजेन्द्र यादव कहानियों पर तो नामवर सिंह हिंदी आलोचना पर अपनी बात कह रहे हैं। खगेन्द्र ठाकुर, सत्यप्रकाश मिश्र, अजय तिवारी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, प्रभाष जोशी जब चाहे तब चले आ रहे हैं। कभी राजेश जोशी, कुमार अंबुज और हरिओम राजोरिया कविताएँ सुना रहे हैं तो कभी देवास से नईम गीत सुनाने चले आ रहे हैं। कभी बद्रीनारायण की कविता का नया स्वाद मिल रहा है तो कभी सुदीप बनर्जी, चंद्रकांत देवताले और लीलाधर मंडलोई जैसे वरिष्ठ कवि युवाओं का मार्गदर्शन कर रहे हैं। शिवमंगल सिंह सुमन को भी मैंने पहली बार विवि के शंभूनाथ सभागार में ही सुना।

उसी दौर में रीवा जैसी छोटी जगह में हबीब तनवीर ने नाटकों पर ४५ दिन की वर्कशाप की और 'देख रहे हैं नयन' जैसे बड़े नाटक को स्थानीय कलाकारों के साथ किया। अलखनंदन, आलोक चटर्जी ने भी वर्कशाप की। राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय का शिविर लगा। भारतीय जन नाट्‌य संघ (इप्टा) के माध्यम से एक रंग आंदोलन रीवा में खड़ा हो गया। कमलाजी कभी खड़े होकर नुक्कड़ नाटक के लिए ताली बजाते मिल जाते तो कभी रिहर्सल देखते हुए। कवियों और कहानीकारों की तरह कई रंगकर्मी भी उस छोटी जगह से निकले। इसमें एक बड़ा योगदान कमलाजी का था। भोपाल के भारत भवन की तर्ज़ पर वे रीवा में एक सांस्कृतिक केंद्र विकसित करना चाहते थे। अर्जुनसिंह के मानव संसाधन विकास मंत्री रहते उन्होंने इस स्वप्न को तक़रीबन साकार कर लिया था, लेकिन बाद में राजनीतिक संकल्प शक्ति के अभाव में वह स्वप्न स्वप्न ही रह गया। विवि में रहते हुए ही उन्होंने 'विन्ध्य भारती' के संग्रहणीय अंकों का संपादन किया। उन्हीं के रहते 'वसुधा' रीवा से प्रकाशित होना शुरू हुई और बाद में उनके भोपाल आने के बाद भोपाल आ गई। कला परिषद भोपाल में उप सचिव रहते हुए 'कलावार्ता' को एक नई ऊह्णचाई उन्होंने दी और लोकोत्सवों की एक परंपरा शुरू की। यह उनकी राजनीतिक प्रतिबद्घता ही थी कि प्रदेश में भाजपा की सरकार आने के बाद उन्होंने उप सचिव की कुर्सी तत्काल छोड़ दी।

प्रगतिशील लेखक संघ को खड़ा करने और उसे लगातार सक्रिय बनाए रखने में कमलाजी के योगदान को उनके घोर निंदक भी नकार नहीं सकते। उनकी सांगठनिक क्षमता की मान्यता मैंने प्रलेस और इप्टा के कई राष्ट्रीय अधिवेशनों में देखी है। हालाँकि उनके ऊपर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे सेवकों का ही भला करते हैं, लेकिन मैंने उनको जितना देखा और समझा है तो वे सभी का भला करते ही दिखे हैं। जो चालाक चेले थे उन्होंने केवल उनका दोहन किया और उनके संबधों का अपने कॅरियर के लिए इस्तेमाल किया। कमाल यह था कि संगठन के लिए कमलाजी बिना किसी तर्क-वितर्क के अपना दोहन करवाते रहते थे। नए रचनाकारों को उन्होंने जितना अधिक रेखांकित किया और सतत मंच दिया, शायद ही किसी और ने किया हो। अपने अंतिम दिनों तक वे हम जैसे बिलकुल अनगढ़ रचनाकारों से लिखने के लिए कहते रहते थे। अर्जुनसिंह से उनकी मित्रता जग जाहिर थी, वे अपने समय के कद्दावर नेता थे, उस समय भी कमलाजी जब उनसे बात करते थे तो उतना ही झुकते थे, जितने में विनम्रता दिखे, चापलूसी नहीं।

व्यक्तिगत रूप से वे अपने मित्रों और दोस्त शिष्यों को कितना ख़्याल रखते थे, इसके लिए मेरे पास बेहद निजी उदाहरण हैं। १९९६ में जब मेरे पिताजी की मृत्यु हुई और मैं गाँव में था। उस समय तक गाँव में दूरभाष और मोबाइल की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। कमलाजी को पिताजी की मृत्यु के बारे में पता चला तो उन्होंने बहुत ही सांत्वनाभरा पोस्टकार्ड लिखा। यह भी लिखा कि टूटना मत मैं अभी ज़िंदा हूँ। तब से वे मुझे हमेशा पिता की तरह ही लगे। पिता की तरह ही उनसे प्रेम भी करता था और नाराज भी था।

नामवर सिंह की तरह वे बड़े आलोचक भले न रहे हों, लेकिन वक्ता उनकी टक्कर के थे। समझ उनसे उन्नीस नहीं थी। संगठन खड़ा करने और लोगों को जोड़ने में तो वे इक्कीस नहीं पचास थे। मुझे लगता है कि वे स्वर्गलोक जाकर यमराज को भी समझा रहे होंगे कि तू गरीबों को बहुत मारता है और अमीर भ्रष्टों को बख्श देता है। जरा समानता का व्यवहार कर। तू भी अच्छा इंसान बन। कमलाजी वहाँ पहुँचते ही परसाई और मुक्तिबोध से मिल आए होंगे। नागार्जुन, सुदीप बेनर्जी, हबीब तनवीर, भीष्म साहनी और नईम आदि के साथ कविता, कहानी और रंगमंच के नए अंदाज़ पर बात करने लग गए होंगे। हो न हो जाते ही वहाँ कोई रचना शिविर लगा बैठे हों। नर्क को स्वर्ग बनाने का कोई आंदोलन छेड़ दिया हो। वे वहाँ कुछ भी कर रहे हों, भी कर रहे हों, यहाँ तो सूनापन छोड़ गए हैं। विनम्र श्रद्घांजलि!
-ओम द्विवेदी

सोमवार, 21 मार्च 2011

फागुन सिर पर हाथ रख, बैठा मिला उदास

मेरे इन दोहों को ठीक होली के दिन भाई शशिभूषण ने अपने ब्लॉग हमारी आवाज पर पोस्ट किया, पढ़कर लगा इन्हें मीठी मिर्ची पर भी होना चाहिए। यहाँ पढ़ें, वहां पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ-http://hamariaavaaz.blogspot.com

सूरज ने जबसे किया, फागुन को उद्दंड।
पानी
-पानी लाज से, हुई बेचारी ठंड॥

गेर खेलने सड़क पर, निकले सातों रंग।
फागुन
हंसता देखकर, चांद संवारे अंग॥

आंखों-आखों सज गया, फागुन का बाजार।

दिल वाले करने लगे, सपनों का व्यापार

सपने सब टेसू हुए, केसर-केसर रूप।

अंग-अग फागुन हुआ, बदन उलीचे धूप॥


ढोल, मजीरे, मसखरी, रंग, गीत, सत्कार।

प्रेम पंथ में आज भी, फागुन है त्योहार॥

आंखें प्यासी हो रहीं, तन-मन तपे बुखार।
फागुन के बीमार का, फागुन ही उपचार॥

कली-कली का रूप अब, आंखें रहीं सहेज।
फागुन चुपके से बना, सपनों का रंगरेज॥

बहकी-बहकी-सी लगे, हवा छानकर भंग।
गाल गुलाबी देखकर, बहक रहे हैं रंग॥

अपने कर पाते नहीं, अपनों की पहचान।
रंगों ने जबसे किया, सबको एक समान॥

अचरज करते ही मिले, सारे वैद्य-हकीम।
फागुन से मिलकर गले, मीठी हो गई नीम॥

धरती से आकाश तक, पुख्ता सभी प्रबंध।
तितली ने फिर भी किया, फूलों से संबंध॥

नुक्कड़-नुक्कड़ पर लगी, रंगों की चौपाल।
गाल शिकायत कर रहे, छेड़े हमे गुलाल॥

बहते पानी में नहीं, ठहरे कोई रंग।
ठहरा पानी ही करे, रंगों से सत्संग॥

महंगाई को देखकर, उड़ा रंग का रंग।

फागुन करे गुलाल से, नए तरह की जंग॥

जंगल की परजा सभी, देख-देखकर दंग।
गीदड़ पाता जा रहा, शेर सरीखा रंग॥

रंग तोड़ने लग गए, फागुन का कानून।
लाल-लाल पानी हुआ, काला-काला खून॥

सपने, आंखें, भूख सब, हैं बाजार अधीन।
रंग, अबीर, गुलाल से, कैसे हों रंगीन॥

राजा-परजा साथ में, मिलकर खेलें फाग।
परजा डूबी प्रेम में, राजा करता स्वांग॥

दिल्ली में ही कैद हैं, सुख के सभी वसंत।
जो कुछ आया यहां, लूट गए श्रीमंत।

सभी सुखों के वाक्य में, दुःख का एक हलंत।
जीवन के इस चक्र में, हरदम कहां वसंत॥

चेहरे पर झुर्री दिखी, हो गए बाल सफेद।
तु वसंत की उम्र से, व्यक्त कर रही खेद॥

रंगों को होने लगा, मजहब का अहसास।
फागुन सिर पर हाथ रख, बैठा मिला उदास॥

गुपचुप किया विपक्ष ने, राजा से संवाद।

रही सलामत होलिका, भस्म हुआ प्रहलाद॥

वेदपाठ भगवा करे, बोले हरा अजान।
फगुआ गाए प्रेम से, मिलकर हिंदुस्तान॥

रंगों से है कर रहा, फागुन यह अनुरोध।
आपस में करना नहीं, आगे कभी विरोध॥

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

दीप आज भी लड़ता है संग्राम

जिस देहरी पर दीप रखने के लिए
तरसते रहते थे महीनों
वह छूटी जा रही है धीरे-धीरे

जिस दीये की बाती बनाने के लिए
लड़ते थे सारे भाई-बहन
उसने भी बदल ली है अपनी शक्ल

जिन नए कपड़ों के लिए
नाराज हो जाते थे पिता से
उन्हें बेटे को दिलाने में अब फूल जाता है दम

जिन सपनों को देखकर
आखें रोज़ मनाती थीं दिवाली
आज वे हो रहे हैं अमावस से भी काले

पहले हम दिवाली मनाते थे
अब दिवाली हमें मनाती है
पहले हम ज़िंदगी जीते थे
अब ज़िंदगी हमें जीती है।

लेकिन दीप कल भी लड़ता था अंधेरे से संग्राम
आज भी लड़ता है
कल भी लड़ेगा।

दीपावली की शुभकामनाएँ...

-ओम द्विवेदी

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

कुछ रोशन दोहे

झालर, झूमर, दीप सब, सजकर हैं तैयार।
अँधकार के तख्त को, पलटेंगे इस बार॥

अँधियारे की बाढ़ में, चली दीप की नाव।
घर-घर पहुँची रोशनी, रोशन सारा गाँव॥

बंद आँख में रात है, खुली आँख में भोर।
पलकें बनकर पालकी, लेकर चलीं अँजोर॥

उल्लू के संग में बनी, लक्ष्मी की सरकार।
हंस लगाकर टकटकी, देखे बारम्बार॥

लक्ष्मी, दीप, प्रसाद सब, बेच रहा बाजार।
जिसकी मोटी जेब है, उसका है त्योहार॥

देहरी दुल्हन बन गई, दीवारों पर रंग।
सात रंग की रोशनी, बनकर उड़े पतंग॥

मावस ने है रच दिया, यह कैसा षडयंत्र।
कहे रोशनी ठीक है, अँधियारे का तंत्र॥

नई-नई शुभकामना, नए-नए संदेश।
दीवाली लेकर चली, बाँटे सारे देश॥

सूरज जब दीपक बने, हो जाती है रात।
दीपक जब सूरज बने, दिखने लगे प्रभात॥

सूरज ने जबसे किया, जुगुनू के संग घात।
लाद रोशनी पीठ पर, घूमे सारी रात॥

पसरी है संसार पर, जब-जब काली रात।
एक दीप ने ही उसे, बतला दी औकात॥

सोता है संसार जब, बेफिक्री की नींद।
रात पालती कोख में, सूरज की उम्मीद॥

नहीं चलेगा यहाँ पर, अँधियारे का दाँव।
पोर-पोर में रोशनी, यह सूरज का गाँव॥

उँजियारे का है बहुत, मिला-जुला इतिहास।
कुछ आँखों के पास है, कुछ सूरज के पास॥

मावस के हाथों हुई, जब भी रात गुलाम।
दीपक ने तब-तब लड़ा, एक बड़ा संग्राम॥

दीप बाँटता रोशनी, गुरु बाँटे सद्ज्ञान।
जब मावस की रात हो, दोनों एक समान॥

सिंहासन के पास है, सिंहासन का घात।
दीप तले हरदम रहे, एक छोटी-सी रात॥

फाइल-दर-दर फाइल बुझा, लोकतंत्र का दीप।
करे रोशनी आजकल, मंत्री जी की टीप॥

दीवाली ने बाँट दी, थोड़ी-थोड़ी आग।
मावस को गाना पड़ा, खुलकर दीपक राग॥

भूख अमावस की निशा, रोटी रोशन दीप।
आदम की दुनिया करे, दोनों एक समीप॥

अँधकार के राज में, दीपक की हुंकार।
तुझसे लड़ने के लिए, आऊँगा हर बार॥

दिल्ली जैसी हो गई, मावस की हर चाल।
दीपक से सौदा करे, कर दे मालामाल॥

जितना लंबा है यहाँ, मावस का इतिहास।
उतना ही प्राचीन है, दीपक का उल्लास॥

संध्या से ही बंद है, सूरज से संवाद।
अँधियारे का भोर से, दीप करे अनुवाद॥

रातें कलयुग की कथा, दीप कृष्ण का रास।
प्रेम गली में बाँटता, वह दिन-रात उजास॥

आज देखते बन रहा, दीपक का उन्माद।
ज्यों मावस की रात में, हो पूनम का चाँद॥

देहरी से आँगन तलक, दीपक का संसार।
छिपकर चाँद निहारता, धरती का श्रृंगार॥

काली होती जा रही, महँगाई की रात।
भूखे को कैसे मिले, रोटी का परभात॥

-ओम द्विवेदी


नईदुनिया दीपावली विशेषांक-२०१० में प्रकाशित
चित्र - गूगल से साभार

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

मत कर रे तकरार पड़ोसी

मत कर रे तकरार पड़ोसी।
हम दोनों हैं यार पड़ोसी ।


चाँद यहाँ भी वैसा ही है,
जैसा तेरे द्वार पड़ोसी।

एक- दूसरे के दुक्खों में,
रोये कितनी बार पड़ोसी।

अपनी-अपनी रूहों का हम,
करते हैं व्यापार पड़ोसी।

रोटी-बेटी के नातों पर,
मत रख रे अंगार पड़ोसी।

बम का मजहब बरबादी है,
दिल की बोली प्यार पड़ोसी।

हम लड़ते हैं चौराहे पर,
हँसता है संसार पड़ोसी।

आ मिल बैठें पंचायत में,
बन जायें परिवार पड़ोसी।

  • ओम द्विवेदी
(यह ग़ज़ल काफी पहले कही थी, वर्तमान संदर्भों में याद आई। चित्र-गूगल से साभार।)

बुधवार, 29 सितंबर 2010

दिल सबसे बड़ी इबादतगाह

रगों में दौड़ने के पहले लहू यह नहीं पूछता कि तू हिंदू है या मुसलमान, साँसें फेफड़ों से उसका मज़हब नहीं पूछतीं, सपने हिंदू-मुसलमान की आँख देखकर नहीं अँकुरते, आँसू पलकों से उसकी ज़ात पूछकर नहीं लुढ़कते, कोख में पल रहे शिशु की नाल किसी मंदिर-मस्जिद से नहीं जुड़ती। होठों पर हँसी न पंडित से पूछकर आती न मौलवी से, परिंदे मंदिर-मस्जिद की मुडेरों पर बैठने से पहले न राम से इजाज़त लेते न अल्लाह से, सात सुरों के भीतर ही ध्वनित हैं मंत्र और अज़ान। धर्मस्थलों की देहरी देखकर फूलों की ख़ुश्बू नहीं बदलती, सूरज अलग-अलग रोशनी नहीं बाँटता, चाँद दोनों के दरवाज़े अलग-अलग नूर लेकर नहीं आता, हिंदुओं के आदेश से न गंगा पावन होती और न ही मुसलमानों के हुक्म से पाक होता आबे ज़मज़म। इतनी बड़ी दुनिया बनाने वाला अपने लिए कभी भी मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर बनाने के लिए नहीं कहता। समंदर कभी चुल्लू में नहीं समाता, आसमान मुठ्ठी में क़ैद नहीं होता, धरती किसी से छत नहीं माँगती।

खुदा ने धरती बनाई तो हमने उसमें सरहदें खीच दीं, उसने अनंत बनाया तो हमने उसे पूरब-पश्चिम बना दिया, ऊपर वाले ने एक वक़्त बनाया तो हमने उसके चौबीस टुकड़े कर दिए। उसने क़ायनात बनाते हुए आदमी-आदमी में फ़र्क़ नहीं किया, लेकिन हमने ख़ुदा और ख़ुदा में फ़र्क़ कर दिया। उसने आदमी और आदमी के लहू के रंगों में फ़र्क़ नहीं किया, लेकिन आदमी ने उसे अलग-अलग रंगों के चोले पहना दिए। जिन पत्थरों को उसने खाइयों को पाटने के लिए बनाया था, उनसे हमने अपने-अपने ख़ुदाओं की मीनारें खड़ी कर लीं, फिर उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें हाथों में उठा लिए। जिसकी अदालत में चीटी से लेकर हाथी तक का और भिखारी से लेकर बादशाह तक का फैसला होता है, हम उसका फैसला करने के लिए अदालतें लगाने लगे। जिसने पेड़ों को हरापन दिया, फूलों को महक दी, नदियों को प्रवाह दिया, हवा को प्राण दिया, आकाश को ऊँचाई और समंदर को गहराई दी...हम उसे इंसाफ़ देने लगे।

अपना क़द बड़ा करने के लिए जो ख़ुदा को छोटा करे, वह कभी उसका बंदा नहीं हो सकता। ईश्वर के नाम पर जो उसकी सबसे अमूल्य कृति मनुष्य को नुकसान पहुँचाए वह कभी उसका भक्त नहीं हो सकता। तुलसी, कबीर, नानक, जायसी, रहीम, बुल्लेशाह, सूफिया आदि ने न तो किसी मंदिर के लिए यात्राएँ की और न किसी मस्जिद के लिए ख़ंज़र उठाए। उन्होंने सारी धरती को ही गोपाल की भूमि कही और सभी आत्माओं को परमात्मा का हिस्सा। राम ने पत्थर को ज़िंदा (अहिल्या) करना सिखाया, ज़िंदा आदमी को पत्थर में तब्दील करना नहीं। किसी भी आत्मा को तकलीफ़ देना परमात्मा के साथ सबसे बड़ा धोखा है। अगर इंसानियत के माथे पर ज़रा भी ख़ून दिखता है तो सारे मौलवियों का शांतिपाठ व्यर्थ है और हमारी प्रार्थनाएँ मुजरिम।

आज अयोध्या विवाद का फैसला होना है, संयोग से आज का दिन गुरु (गुरुवार) का है। उस गुरु का जो हमे अँधेरे से उजाले की ओर ले जात है, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाता है। आज उस गुरुत्व की भी परीक्षा है। हमारे संस्कारों, इरादों और सभ्यताओं का इम्तहान है। हम इसमें सफल हुए तो इंसान कहलाएँगे और असफल हुए तो हैवान। यहाँ छोटी अदालत की अपील तो बड़ी अदालत में हो जाएगी, लेकिन ऊपर वाले की आख़िरी अदालत में कोई अपील नहीं होती। अपने किए की सज़ा हर हाल में भुगतनी होती है। याद रखें दिल से बड़ी कोई इबादतगाह नहीं होती और मोहब्बत से बड़ा कोई मज़हब नहीं होता।
  • ओम द्विवेदी
(दिल की इस आवाज़ को मैने अख़बार के लिए शब्दों में ढाला था, लेकिन ३० सितंबर के दिन २६ पन्नों के हमारे अख़बार में इतनी जगह नहीं थी कि इसे छापा जा सके। अतः अभिव्यक्ति की आज़ादी का महामंच 'ब्लॉग जिंदाबाद!')

बुधवार, 1 सितंबर 2010

फिर राजाओं के ख़ून से ललकार रहा है कंस


जैसे कारागृह में बंद थे वसुदेव और देवकी, वैसे ही हर रोशनी बंद है अँधेरे में। जैसे उनके हाथ-पाँव जकड़े से बेड़ियों से, सच बंधक बना हुआ है उसी तरह। जैसे कंस अपनी जान बचाने के लिए आमादा था पूरे राज्य का बचपन मार देने पर, उसी तरह हर सत्ता अपनी रक्षा के लिए काट देना चाहती है निरीज जनता का गला। जैसे पूतना कृष्ण को दूध के साथ पिला देना चाहती थी ज़हर, उसी तरह बाज़ार हमें गोदी में बैठाकर करा रहा है स्तनपान। जैसे कालिया नाग ने ज़हरीला कर दिया था यमुना का पानी, वैसे ही हमारे पापों से पट गई हैं नदियाँ। जैसे कौरव पांडवों को नहीं देना चाहते थे अँगुल भर जमीन, भू-माफिया उसी तरह कुंडली मारकर बैठे हैं ग़रीबों की भूमि पर। शकुनी की चाल के समक्ष जैसे पराजित हो गए थे धर्मराज युधिष्ठिर, अपराधियों और गुंडों के समक्ष हार रहा है समय।

निरंतर खींची जा रही है द्रोपदी की चीर, अट्टहास कर रहा है राजदरबार, बेबस भीष्म पीटे जा रहे हैं अपनी छाती, दुर्योधन के रक्त के लिए अभी भी खुले हैं पांचाली के केश, सुदामा अभी भी भूखा है कृष्ण के दरवाज़े पर, कुंती अभी भी अपने बेटों के लिए दर-दर कर रही है न्याय की फरियाद, कर्ण अपनी पहचान के लिए देख रहा है सूरज की ओर, गुरु द्रोण माँगे जा रहे हैं एकलव्य से अँगूठा, अभिमन्यु मारा जा रहा है चक्रव्यूह में, सत्ता की चौसर पर रोज़ लग रहे हैं दाँव और कुरुक्षेत्र में मारी गई १८ अक्षौहिणी सेना की तरह गुमनाम मर रहे हैं सपने और ग़रीब। आज महाभारत से भी कठिन समय है भारत में और तुम्हारा इंतज़ार है पार्थसारथी।

तुम्हारा पांचजन्य खो गया है पूजाघर से, तुम्हारा सुदर्शन चक्र छीन ले गए हैं डकैत, तुम्हारी बांसुरी नीलाम हो गई, तुम्हारा पीतांबर बेच खाया हमने, तुम्हारी गोपियों की आबरू हमारी आँखों के सामने लुटी, जिन गायों को चराकर तुम कान्हा बने उन्हें हमने दूध निचोड़कर सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया, जो चरवाहे तुम्हारे साथ जंगल में खेला करते थे वे कचरा पेटियों में कचरा बिन रहे हैं, जो तुम्हारे साथ माखन खाया करते थे वे जूठन खा रहे हैं। कान ऐंठकर जिस राजधानी को तुमने उसकी औकात बताई, वह आज हमारे कान खींच रही है। गोपियों और सखाओं का मौन क्रंदन तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है परमपुरुष।

जब तुमने पांडवों को युद्घ लड़ने के लिए प्रेरित किया था, जब उन्हें महारूप दिखाकर उनका रथ युद्घस्थल की ओर खींचा था, तब दुश्मन सामने खड़ा था। उससे लड़ने पर राज्य या स्वर्ग मिल सकता था। आज हम चारों ओर दुश्मनों से घिरे हैं, फिर भी उन्हें पहचानते नहीं। जिन्हें भी मारने के बारे में सोचते हैं, वे हमारे हित चिंतक दिखाई दिखाई देते हैं। जिसके विरुद्घ भी बंद होने लगती हैं मुठ्ठियाँ, वह प्रचारित करने लगता है स्वयं को हमारा देवता। कभी-कभी तो तुम्हारी शक्ल धारण कर लेते हैं दुश्मन। कभी तुम्हें पूजने वाले तो कभी बेचने वाले दुश्मन दिखते हैं। कभी वोट लेने वाले तो कभी देने वाले दिखते हैं दुश्मन। कभी थाने बैरी लगते हैं तो कभी मुजरिम। हमसे बड़ा हमारा असमंजस है आज।

फिर आ गई है भाद्रपद की काली रात, फिर राजाओं के ख़ून में घुसकर कंस ललकार रहा है जनता जनार्दन को, फिर बिना आँख वालों के कब्ज़े में है सिहासन, फिर आदमी का ख़ून जम रहा है नाना प्रकार के भयों से। तुम आओ, चाहे किसी देवकी की कोख से या हमारी आत्माओं को बनाओ वह कोख जिससे पैदा हो सके कृष्णत्व। इस बार तुम्हें दुश्मन भी बताना पड़ेगा और लड़ने का तरीका भी, शास्त्र भी सुनाना पड़ेगा और उठाना पड़ेगा शस्त्र भी। तुम कब आओगे कन्हैया।
  • ओम द्विवेदी

संलग्न चित्र
कंस की भूमिका में ओम द्विवेदी। दयाप्रकाश सिन्हा लिखित 'कथा एक कंस की' नाटक का मंचन वर्ष २००० में राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय,नईदिल्ली के स्नातक दिलीप पावले के निर्देशन में किया गया।

रविवार, 13 जून 2010

जाति पूछिए साधु की

मै भी कितना उजबक था जो 'जाति' को बुराई मानता था और कभी-कभार उसके खिलाफ बोलकर खुद को भगतसिंह। गाँधी, लोहिया, मार्क्स आदि ने ऐसा दिमाग खराब कर दिया था कि 'जाति' होने से घिन होने लगी थी। पढ़-लिखकर खुद को आदमी मानने लगा था। मै कैसा बंदर हो गया था कि जाति-धर्म की सुंदर पोषाकें, स्वर्ण जड़ित राजमुकुट अपने ही हाथों नोचता रहता था। सभी जातियों का प्रिय बनने के चक्कर में अपनी ही जाति का तर्पण करने लगा था। भला हो सरकार का कि उसने डूबती नाव बचा ली, दीये को बुझने न दिया। मेरी जाति की महानता को नमस्कार करने सरकार स्वयं मेरे द्वार आ रही है। जवानी भले 'जाति' के हीनभाव से ग्रस्त रही हो, बुढ़ापा उसी पर इतराते हुए कटेगा। जिस जाति-धर्म में जन्म लिया आज उसे सीना तानकर बताने का समय आ गया है, आगे उस पर बलिदान होने का मौका भी मिलेगा। क्रांति के चक्कर में जिन्होंने अपने जातिनाम का खतना कर दिया है, वे भुगतेंगे। वैसे उन्होंने भुगतने के लिए अपनी जाति गया नहीं भेजी है, जन्म का प्रमाण पत्र निकालकर वे अपनी रक्तजाति सरकार को बताएँगे और आने वाले समय में उसका भी लाभार्जन करेंगे।

'जाति' गिनना किसी खब्ती का काम नहीं, बल्कि यह सरकार का सुनियोजित कार्यक्रम है। इसके दूरगामी लाभ हैं। यह सरकार द्वारा सचाई की स्वीकारोक्ति है। सरकार वर्षों तक जनतंत्र की स्थापना में लगी रही। वह दुनिया से कहती थी कि हम सबसे बड़े जनतंत्र हैं। इस जनतंत्र को बनाए रखने के लिए वह हर पाँच साल में 'जन' की गिनती करवाती थी। जन-जन को गिनकर जनगण गाती थी। सरकार ने सोचा कि जब जातियों के महासागर में जन की नाव डूब रही है तो उसकी गिनती ही क्यँू की जाए? जब जाति के जंगल में 'जन' नाम का डायनासोर विलुप्त हो रहा है तो फिर उसे खोजने में सरकारी खजाना क्यूँ खाली किया जाए? जन की बजाय जाति की गिनती ही करवा ली जाए। रही बात 'जनतंत्र' के नामकरण की तो उसे भी बॉम्बे से मुम्बई मद्रास से चेन्नई की तरह बदलकर 'जातितंत्र' कर दिया जाएगा। फिर भारतवासी गर्व से कह सकेंगे कि हम दुनिया के इकलौते और सबसे बड़े 'जातितंत्र' हैं।
जाति की गिनती हो जाने के बाद जरूरत के हिसाब से उनके प्रदेश बनाए जा सकेंगे। अलग-अलग जातियों के अलग-अलग प्रदेश। अपनी भाषा, अपना पहनावा। ठाकरे साहबान जैसा महाराष्ट्र को बनाना चाहते हैं तकरीबन वैसा ही हर प्रदेश होगा। उसी जाति का मुख्यमंत्री, उसी जाति के मंत्री-विधायक। कभी जब जातियों में युद्घ करवाना हो तो देशभर से सबको इकठ्ठा नहीं करना पड़ेगा। रथयात्रा वगैरह नहीं निकालनी पड़ेगी। मुख्यमंत्री सरकारी योजनाओं की तरह युद्घ की घोषणा करेंगे और जनता-जनार्दन टूट पड़ेगी। एक ही जाति के लोग एक प्रदेश में रहेंगे तो जातियों में भेदभाव जैसा कुछ नहीं होगा। रोटी-बेटी का नाता आसान रहेगा। एक ही गोत्र में इश्क करने की सजा अगर प्रेमी-प्रेमिकाओं को कभी-कभार मिल गई तो वे उसे भुगत लेंगे।

जातिप्रदेश जैसी बड़ी क्रांति न भी हो पाए तो भी पार्टियों को चुनाव में टिकट बाँटना आसान हो जाएगा। उम्मीदवार चुनने की मगजमारी नहीं करनी पड़ेगी और दूसरी जातियों के नेताओं को यह भी नहीं दिखाना पड़ेगा कि तुम्हारे नाम पर विचार चल रहा है। जाति की गिनती के बाद ब्राह्मणों के सूबे में पंडित, क्षत्रियों के सूबे में ठाकुर, पटेलों और यादवों के सूबे में पटेलों-यादवों को टिकट मिलेगी। लोकतंत्र के रहस्य रहस्य नहीं रहेंगे। जब ब्राह्मणों वाली सीट पर दुबे, तिवारी, मिसिर, क्षत्रियों की सीट पर सेंगर, परिहार बघेल, वैश्वों की सीट पर गुप्ता, नेमा, अग्रवाल, लालाओं की सीट पर खरे, श्रीवास्तव, भटनागर तथा पटेलों-यादवों की सीट पर फलां-फलां-फलां अपना सिर फोड़ेंगे तब समस्या पर पुनः विचार होगा। अगली गणना में पांडे में भी पांडे तलाशे जाएँगे। बाल की भी खाल निकाली जाएगी। बेचारे मतदाता के दिमाग से भ्रम के बादल छटेंगे और वह हर पाँच साल में (अगर बीच में कुरसी लकवाग्रस्त नहीं हुई तो) एक बार जाति के काम आ सकेगा।

जिस जाति की सरकार रहेगी, उस जाति को विशेष पैकेज दिया जाएगा। उसी को गरीब और बेरोजगार मानकर उसके उत्थान के लिए योजनाएँ लाई जाएँगी। गरीबी रेखा के नीचे उन्हीं को माना जाएगा। सड़कें उसी जाति के लिए बनाई जाएँगी। बसें और रेलें भी उन्हीं के लिए चलेंगी। सरकारी नौकरी में उन्हीं के लिए आरक्षण होगा। राशन की दुकानों में राशन भी सरकार वाली जाति को मिलेगा। सरकारी अस्पतालों में उन्हीं का इलाज होगा। अदालतें उन्हीं के पक्ष में फैसला सुनाएँगी। वही अखबारों में संपादक होंगे। मीडिया में खबरें भी उनकी ही दिखाई और छापी जाएँगी। सड़कों, पुलों और तमाम निर्माण कार्यों के ठेके सरकारी जाति वालों को ही मिलेंगे। दीगर जाति के लोग आम आदमी कहे जाएँगे और शत्रुदेश के निवासी माने जाएँगे। अगर धोखे से हिंद देश के जन माने गए तो नक्सली और उल्फाई होंगे।

सभी जातियों की सरकारों से लाभ लेने के चक्कर में जो लोग अपनी 'जाति' नहीं बताएँगे, वे जेल जाने के लिए तैयार रहें। सरकार से कुछ भी छिपाया तो छिप-छिपकर जीना पड़ेगा। सरकार महाराज मनु के पदचिन्हों पर चलते हुए वर्णव्यवस्था द्वितीय लागू करने जा रही है। कृतघ्न इस राष्ट्रवाद को जातिवाद की संज्ञा देकर उपेक्षित न करें। इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में व्यवधान डालना देशद्रोह माना जाएगा। अतः हिंद देश के सभी जन सरकार को अपनी जाति बताएँ और जब चुनाव का समय आए तो उसे उसकी औकात बताएँ।