बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

छुट्टियों के पीछे- पीछे दफ्तर

कई महीनों बाद लंबी छुट्टी पर गया था। दफ्तर छोड़कर। दीवाली के बहाने छुट्टी मिली थी। यह तो हमारे दफ्तर की कृपा थी कि उसने इतने आसान बहाने पर अवकाश स्वीकृत कर दिया, वरना रिश्तेदारों की शादी करवानी पड़ती, बीवी को बीमार करना पड़ता, दादी जो बीस साल पहले देवलोक को पधार चुकी हैं, उन्हें फिर से स्वर्गवासी करना होता, डॉक्टर से खुद के बीमार होने की पर्ची बनवानी पड़ती, वगैरह...वगैरह। सच पूछिये तो मैं अपने दफ्तर का इसीलिए प्रशंसक हूँ क्योंकि यहाँ छुट्टियों के लिए अपनी रचनात्मकता का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना पड़ता। तनख्वाह कम हो सकती है, इंक्रीमेंट का टोटा हो सकता है, बोनस के लाले पड़ सकते हैं, लेकिन छुट्टियाँ दिल खोलकर मिलती हैं। दूसरों के यहाँ तो अफसर छुट्टियों पर भी कुंडली मारे बैठे रहते हैं।

दफ्तर छुट्टियाँ देने में भले ही उदार हो लेकिन ज्यादा ग्रहण करने में अपन ही फटी में आ जाते हैं। लगता है लंबी छुट्टी न स्वीकृत हो जाए। छुट्टियों पर जाने से पहले यह सोचकर गया था कि अपने साथ राई-तोला भी दफ्तर लेकर नहीं जाऊँगा। घर में पूरा घर का होकर रहूँगा, लेकिन कसम रोजी की दस दिन की छुट्टी में दिन में दस बार दफ्तर लिपट-लिपट कर रोया। आँसू बहा-बहाकर बोला, हमें छोड़कर कहाँ पड़े हो। राम ने जितने बरस बनवास में काटे तकरीबन उतने ही अपन को अखबार में काटते हुए। रात-रातभर आँखें फाड़कर खबरें खोदने की इस कदर आदत हो गई है कि शाम को घर पर रहना किसी अनहोनी की तरह लग रहा था। हर शाम को लगता था कि नौकरी ने मुझे तलाक दे दिया है। घर में कोई मिलने आता तो लगता खबर देने आया है। बात-बात में नजरें खबर तलाशने लगतीं। मैं अगर दूर बैठकर खुद को देखता तो पागल जैसा ही पाता। फिर भी सारे परिजन खुश थे कि मैं कई महीनों बाद छुट्टी पर हूँ और घर पर हूँ।

छुट्टियों की तीसरी-चौथी रात सभ्य और सुसंस्कृत इंसानों की तरह रात दस बजे सो गया। रात बारह बजे अचानक सपना आया कि डेडलाइन पर पन्ने नहीं छूटे हैं और आज अखबार लेट हो जाएगा। फिर संपादक का चेहरा दिखा, सुबह की मीटिंग दिखी, सर्कुलेशन वालों की धमकियाँ दिखीं और अंत में अपना इस्तीफा अपने आप मंजिल की ओर जाता दिखा। अचकचाकर उठ गया और पूरी रात इस्तीफा पकड़ता रहा कि वह पुष्पक विमान पर सवार न हो जाए। फिर तो नीद ही काँच के टुकड़े की मानिंद पलकों में चुभती रही।

वर्षों की साध थी कि सवेरे का सूरज देखूँ। छुट्टियों पर यह इच्छा भी पूरी करनी थी। जिस शहर में सूरज सवेरे कोंच-कोंचकर जगा देता था, वहाँ सूरज बड़े कॉम्पलेक्स के पीछे आ गया था, अतः बिना बाहर निकले उसे देखना मुनासिब नहीं था। सुबह उठा। बाहर निकला तो वह धुँधला-धुधला था और आधा शहर फेंफड़ों में हवा भरने के लिए सड़कों पर घूम रहा था। सूरज वैसा ही था, जैसा कभी-कभार अखबार के पन्नों पर छापा जा चुका था। उसे अगली छुट्टी तक लिए देख लेना था, अतः जीभर कर देखा। लगा अच्छा है कि यह सूरज मेरी तरह अखबार में नौकरी नहीं करता, वरना धरती के आधे लोग तो उसके इंतजार में ही मर जाते। धरती सोती रह जाती। मैं अगर प्रधानमंत्री होता तो चैनलों में दिनभर यह खबर चलती कि मैने सूरज देख लिया। खैर!

दस दिन की छुट्टी बिताने के बाद चलने का समय आया तो घर रोकने लगा। पलभर के लिए लगा कि एक-दो दिन और रुक जाया जाय। बहाना बना दिया जाए कि रेल का रिजर्वेशन नहीं मिला। कल का या परसों का मिला है, लेकिन रुकने का साहस नहीं हुआ। लगा ज्यादा छुट्टी मनाकर लौटूँगा तो दफ्तर भले पहचान ले, लेकिन कहीं आठ कॉलम बावन सेंटीमीटर का अखबारपह ही चानने से न इंकार कर दे। कुल मिलाकर छुट्टी देकर भी दफ्तर पीछे-पीछे लगा रहा।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

नज़र शरीफ़ों की चुपके से तालिबान बनी

दोस्तों! कई दिनों से व्यंग्य पोस्ट कर रहा हूँ। आज आपको ग़ज़लों से रूबरू कराते हैं। सामयिक ग़ज़लें। इन्हें आप व्यंग्यनुमा ग़ज़ल या ग़ज़लनुमा व्यंग्य कह सकते हैं। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'समावर्तन' ने सितंबर अंक में इन ग़ज़लों को प्रकाशित किया है।

मेरी बस्ती की मुलक में नई पहचान बनी।
एक गली हिन्दू तो एक मुसलमान बनी।

दंगों ने बदल दी शहर की आबोहवा,
किताब बच्चों की गीता कहीं कुरआन बनी।

सहम-सहम के परिंदे उड़ान भरते हैं,
नज़र शरीफ़ों की चुपके से तालिबान बनी।

मजहब का सियासत से गठजोड़ ग़ज़ब है,
जनमों की आस्था कुरसी की पायदान बनी।

पहचानना मुश्किल है क़ातिल की शक्ल को,
बम छिपाने की महारत बहुत आसान बनी।

शहर से रूठ गया प्यार का मौसम यारो,
आजकल जिंदगी नफ़रत का संविधान बनी।

सोते में चीख़ता है सुल्तान आजकल

टूट पड़ा आँगन में आसमान आजकल।
साँसों में उठ रहा है तूफान आजकल।

कबूतर ने जने हैं कई नन्हें कबूतर,
डर-डर के बाज भरता है उड़ान आजकल।

फ़क़ीर के कदमों में है रफ़्तार कुछ अधिक,
सोते में चीख़ता है सुल्तान आजकल।

पड़ोसी का घर खंगालते खंजर लिए हुए,
तकिए के नीचे छिप गया शैतान आजकल।

मुर्दा से दिखे चेहरे जो भी दिखे यहाँ,
हँसने लगा है बस्ती में शमशान आजकल।

पहुँचा है माँ की कोख तक बाज़ार का दख़ल,
सामान की मानिन्द हैं नादान आजकल।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

आज मैं गाँधी बन गया

कल सुबह जब कैलेण्डर पलट रहा था, तभी इस बात का ज्ञान हो गया था कि आज २ अक्टूबर है और यह देश मोहनदास करमचंद गाँधी उर्फ महात्मा उर्फ राष्ट्रपिता का जन्मदिन मनाएगा। अतः हर साल की तरह एक बार फिर मेरे पास मौका था गाँधी बनने का। मैंने इस सुअवसर को झपटकर पकड़ा। बक्से में रखे खादी के कुरते को सुबह-सुबह ही धारण कर लिया। मल्टीनेशनल कंपनियों के सारे जींस, जूते, टी-शर्ट वगैरह संदूक में उसी तरह रख दिया जैसे सालभर खादी रखी रहती है। ३६४ दिन अगर बक्से को खादी का सुख मिलता है तो एक दिन जींस, टी-शर्ट और जूते वगैरह का सुख भी मिलना चाहिए।

अब इस बात में शंका-कुशंका तो रही नहीं कि गाँधीजी का जन्मदिन है तो पूरे दिन कार्यक्रम होंगे और सब जगह खादी धारण किए हुए अतिथिओं की जरूरत होगी। कार्यक्रमों की संख्या इतनी अधिक है कि खादीवाले हर इंसान को एक दिन का रोजगार अवश्य मिलेगा। मैंने अपने बदन टंगे कुरते को भरोसा दिलाया कि आज के दिन उदास होने की जरूरत नहीं है। शाम तक निश्चित ही तुम्हें एक भव्य कार्यक्रम मिलेगा और सारे लोग तुम्हारी ओर घूर-घूरकर देखेंगे। बक्से में रखे-रखे तुम्हारे भीतर जो बास समा गई है उस पर आज गुलाब के फूल भी शरमाएँगे।

खादी धारण करने के साथ ही मैंने हमेशा की तरह ढेर सारे संकल्प भी लिए-राष्ट्रपिता भले बन जाऊँ, राष्ट्रपति कभी नहीं बनूँगा। कोई कितना भी पकड़-पकड़ कर बनाए प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री जैसे राजनीतिक पदों पर बैठकर मैं अपना जीवन कलंकित नहीं करूँगा। अंग्रेजों के बनाए सारे पदों, यथा-एसपी, कलेक्टर, तहसलीदार, बाबू वगैरह बनकर अंगरेजों का पाप नही ढोऊँगा। प्यास से तड़फ-तड़फकर प्राण भले ही चले जाएँ, लेकिन मद्यपान नहीं करूँगा। भूखे मर जाऊँ लेकिन मांस नहीं खाऊँगा। आज के दिन किसी भी स्थिति में कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं करूँगा। दिनभर में दो-चार किलोमीटर पैदल जरूर चलूँगा। सालभर भले ही मैंने दूसरों के गाल पर चाटा जड़ा है, लेकिन आज अगर कोई एक गाल पर चाटा मारेगा तो मैं दूसरा गाल भी उसके आगे कर दूँगा। अगर कहीं सत्य बोलने का मौका मिला तो पूरी ईमानदारी से बोलूँगा। चोरी-भ्रष्टाचार से भरे पेट में आज पाप का एक दाना भी नहीं डालूँगा। पूरी तरह अस्तेय और अपरिग्रह। जायज और नाजायज दोनों किस्म की पत्नियों से कह दिया है कि आज ब्रह्मचर्य प्रयोग करूँगा। कल तक भले गरीब का खून चूसा हो, लेकिन आज उसे हरिजन कहूँगा और आज के दिन उसे समाज में सम्मान दिलवाऊँगा। घिन लगे तब भी कोढ़ियों की सेवा करूँगा। बस्तियों में झाड़ू लगाऊँगा। पत्नी से कह दिया कि चाहे जो हो जाए, आज टॉयलेट तुम्ही साफ करना, वरना मैं तुम्हें घर से बाहर निकाल दूँगा। वगैरह-वगैरह...

जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, संकल्पों के बोझ से हमारी कमर टूटने लगी। दोपहर को लगा कि खादी और संकल्प धारण किए हुए पूरे छः घंटे हो गए, लेकिन किसी नामुराद आयोजक की अब तक मुझ पर नहीं पड़ी। एक बारगी लगा कि सब उतार कर आले पर रख दूँ, लेकिन दूसरे पल फिर लगा कि अभी पूरा दिन है, देर रात तक आयोजन चलेंगे। किसी न किसी की नजर तो पड़ेगी। गत वर्ष तक जिन्होंने बुलाया था क्या वे सारे आयोजक हमें भूल गए होंगे। सालभर में क्या गाँधी के इतने सेवक तैयार हो गए कि मेरे जैसा पुराना गाँधीवादी भुला दिया गया।

दोपहर पल्ला झाड़कर चली गई और कोई नहीं आया। मैंने फिर भी सुबह लिया हुआ संकल्प कायम रखा और बकरी का एक गिलास दूध पीकर थोड़ा और इंतजार किया, फिर थोड़ी सलाद और चटनी लेकर दोपहर का खाना निपटाया। खाना पिछले साल की तरह ही बेस्वाद लगा। लगा अगर यह संकल्प पूरे तीन सौ पैंसठ दिन टिक गया तो जीवन नरक हो जाएगा। पीजा-बर्गर, मुर्ग-मसल्लम से लेकर खीर-पुडी तक हमारा नाम ले-लेकर मातम मनाएँगे। खैर...

भोजन प्रसाद के बाद बाहर निकला ही था कि दौड़ते हुए एक सज्जन आए और उन्होंने कहा कि मोहल्ले में गाँधी जयंती का आयोजन है, हम लोगों ने पार्षद को मुख्यअतिथि बनाया था, वह कहीं और चला गया। अब आप ही पधारिए, कार्यक्रम जल्दी करना है। हमें लगा कि हमने सुबह से जो इतने संकल्प ढोए हैं, क्या मोहल्ले के मुख्यआतिथ्य में ही उनका स्वर्गवास हो जाएगा। मैं अभी इतना भी तो नहीं गिरा हूँ कि मुख्यअतिथि बनने के लिए पार्षद का विकल्प बनूँ। मैंने सज्जन को यह कहते हुए झटपट मना किया कि अभी मुझे तीन बजे की प्रार्थना पर जाना है। शाम को बड़े मैदान पर गरीबों को कपड़े बाँटने के लिए मुख्यमंत्री को आना था, मुझे पता था कि इस अवसर पर एक गाँधीवादी का सम्मान किया जाना है और उन्हें फिलहाल कोई मिल नहीं रहा है। जो बड़ी सेटिंगवाले गाँधीवादी थे उन्हें दिल्ली में, जो उनसे थोड़ा कम थे, उन्हें भोपाल में सुबह ही सम्मानित किया जा चुका है। लोकल कोई इतना बड़ा गाँधीवादी नहीं, जो गाँधीगिरी के अलावा कुछ और न करता हो। मुख्यमंत्री के लोकल चमचों से इधर-उधर से कुछ जुगाड़ अपना भी था।

उधर भोपाल से मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर उड़ा होगा कि इधर हमारे पास कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता आया। मुझे अपने कुरते पर गर्व हुआ। मुख्यमंत्री से श्रेष्ठ गाँधीवादी का सम्मान लेकर मैं कुछ हल्का हुआ। घर आया, सम्मान को बैठक कक्ष में टांगा और दिनभर से जिस बोझ से कमर टूट रही थी, उसे उतारकर संदूक में रख दिया।

बुधवार, 30 सितंबर 2009

दूसरे रावण की तलाश में राम

मैं दशहरे की धूमधाम देखकर लौट रहा था कि देर रात राम से मुलाकात हो गई। जटाएँ बिखरी हुई, पसीने से तरबतर, गैरिक वस्त्र धूल-धूसरित, चेहरे पर परेशानियों की अनगिनत रेखाएँ, आँखों में आँसू थामे हुए, तकरीबन पराजित से। पहले रामलीला में और फिर टीवी में उनकी शक्ल देखते हुए उनसे पुराना परिचय-सा लगा। बिना कुछ सोचे-विचारे मैंने उनसे उनका हाल पूछा-

-कुछ परेशान से दिख रहे हैं राम। हमें लगता है आपने आज ढेरों रावण मारे हैं। रावण मार-मारकर थक गए हैं?

-नहीं वत्स! तुमने गलत समझ लिया। मैं शाम से ही रावण को खोज रहा हूँ। हाथ में धनुष बाण लिए रावण की तलाश में भटक रहा हूँ, लेकिन रावण का कोई अता-पता नहीं। मैं चिंतित हूँ कि अगर आज की रात रावण नहीं मार पाया तो रावण कैसे मरेगा और लोग मुझे राम कैसे मानेंगे?

-शाम से ही धू-धू कर इतने रावण जल रहे हैं और आप कहते हैं कि आपको रावण मिला ही नहीं। आज तो पूरे शहर में केवल रावण ही रावण दिख रहा था। आप कैसे राम हैं?

-मेरी यही तो मुश्किल है। मैं कैसे बताऊँ कि मै कैसा राम हूँ। आज जगह-जगह नकली रावण खड़े थे और उन्हें नकली राम मार रहे थे। मैं रावण की तलाश में जहाँ भी गया लोगों ने मुझे राम मानने से इंकार कर दिया।

-कोई बात नहीं प्रभु, चलिए मैं एक रावण बनाता हूँ और आप उसका वध करिएगा। मैं उसमें दो-चार बम रख दूँगा। एटम बम जैसी आवाज होगी। मोहल्ले के बच्चे ताली बजाएँगे। आपको भी मजा आएगा और बच्चों को भी।

-मैं मजे लेने के लिए इस धरती पर नहीं घूम रहा हूँ वत्स! मैं तो आज सचमुच ही रावण मारने निकला था, लेकिन वह जाने कहाँ छिपा बैठा है।

-आप तो अंतर्यामी हैं। जरूर जानते होंगे कि वह कहाँ छिपा है। आँखें बंद करके देखिए न!

-जिस रावण को मैंने पहली बार मारा था, वह धरती का सबसे मायावी राक्षस माना जाता था। इसके बाद भी मैने उसका वध किया। अब जिस रावण का मैं पीछा कर रहा हूँ, वह उससे भी मायावी, उससे भी चतुर, उससे भी ज्ञानी और उससे भी अधिक अपराजेय है।

-कैसे?

-आज शाम को जब मैंने पहली बार रावण को तलाशा तो वह अट्टहास करता मिला। मेरा उपहास करता हुआ। दूर से ही चिल्लाते हुए उसने कहा कि तुम क्या अब तो सारे देवी-देवता मिलकर भी मुझे नहीं मार सकते। उसके दस सिर गर्व से तने हुए थे। हँसता भी दस मुखों से था। मैं अपनी सारी शस्त्र विद्याओं के बलबूते मारने के लिए जैसे ही उसके पास गया, उसने अपने नौ सिर झट से छिपा लिए और भद्र दिखने लगा। मैने उसकी माया मारने के लिए जैसे ही तीर धनुष पर चढ़ाया, सारी जनता मेरी ओर दौड़ पड़ी। कहने लगी यह मेरा अन्नदाता है। मेरा पालनहार। इस पर वार करने वाले तुम कौन हो। मेरी जयकार करने वाले सारे लोग उस तरफ दिखे और मैं वहाँ से अपनी जान बचाकर भागा। मैं अपने भक्तों को मार नहीं सकता और भक्त मुझे मारें यह देवताओं को अच्छा नहीं लगेगा।

-फिर क्या हुआ?

-मैने उसी रावण को फिर दूसरी शक्ल में देखा। उसे लगा कि आज नहीं तो कल लोग मुझे पहचान जाएँगे। इसलिए उसने अपने दस सिरों का विसर्जन कर लिया। उसने मेरी ही शक्ल धारण कर ली। जगह-जगह रावण की जगह राम दिखाई दे रहे हैं। जैसे बालि-सुग्रीव युद्घ में बालि को पहचानने में मुश्किल हो रही थी, उसी तरह राम की शक्ल में रावण को पहचानना मुश्किल है। मैं जानता हूँ रावण अभी नहीं मरा है, फिर भी असहाय हूँ। मैंने एक चीज और देखी है..

-वह क्या प्रभु!

-अब लोग रावण के अभ्यस्त हो गए हैं। अब उन्हें रावण राक्षस नहीं लगता। जब साधुओं और सज्जनों को त्रस्त करता है तो लो कहते हैं, यह उसका काम है। जब सीता पर कुदृष्टि डालता है, तब भी लोग यही कहते हैं। सोने की लंका देखकर भी लोग सहज ही कह देते हैं कि वह राजा है, सोने की लंका उसकी नहीं होगी तो गंगू तेली की होगी? पहले तो रावण सज्जनों के खून और उनकी हड्डियाँ लेता था, तो कुछ तकलीफ भी होती थी। अब तो कभी-कभार केवल वोट लेता है, इसलिए लोगों को तनिक भी तकलीफ नहीं होती?

-तो क्या अब वह इसी तरह जीवित रहेगा? उसके अंत का कोई उपाय नहीं?

-चिंता मत करो वत्स! अब मैं उसे 'वोट' बनकर मारूँगा। मैं जल्द ही 'मतावतार' लूँगा।

रविवार, 27 सितंबर 2009

माँ-भक्त संवाद-चार

-भक्तों! धुएँ से मेरा दम घुट रहा है, शोर से मेरे कान फटे जा रहे हैं, तुम्हारे इन अश्लील नृत्यों मेरी आँखें शर्म से झुकी जा रही हैं। अब मुझे मुक्त करो। मुक्ति दो मुझे।

-कैसी बात कर रही हो माँ! हम भक्तों को मुक्त करना तो तुम्हारा काम है। तुम स्वयं कैसे मुक्त होने की बात करने लगी। इस तरह चल दोगी तो हमे कौन मुक्त करेगा। और यह धुआँ नहीं है माँ! हवन है, तुम्हारा भोजन। और जिसे तुम शोर कह रही है, यह तुम्हारी भक्ति में गाया जा रहा गीत है। इसे अश्लील नृत्य मत कहो, यह तो गरबे की महान परंपरा है। पूरा देश कर रहा है। टीवी में भी तो हो रहा है।

-अगर हवन भोजन है और यह शोर भक्ति, तो खीर-मलाई छोड़कर दो-चार दिन तुम भी यही भोजन करके देखो।

-माँ! आप इतनी अनजान मत बनो। हम लोग बीड़ी-सिगरेट से लेकर गाँजे के दम तक कितना धुआँ पीते हैं, यह तो तुम पूरे नौ दिन देखती ही हो। सड़क पर चलते हुए चौबीस घंटे मोटरों-कारों का धुआँ भी हम ही पीते हैं। धुआँ पी-पीकर ही हम सीने में दम भरे हुए हैं। और तुम कितना शोर सुनती हो माँ! अधिक से अधिक नौ दिन ही न! हम लोग तो सोते-जागते गाड़ियों की घर्र-घर्र, हार्न की चिल्ल-पों सुनते हैं। यह सुनकर हमारे कान इतने पक्के हो गए हैं कि तुम जिसे शोर कहती हो, वह हमे संगीत लगता है।

-फिर भी अब नौ दिन का कर्मकांड पूरा हो गया है।

-तुम कहो या न कहो, चाहो या न चाहो, अब तो हम तुम्हें प्रवाहित करेंगे ही। नौ दिन के बाद तुम्हारा विसर्जन आवश्यक है।

-देखो न! तुम मुझे माँ भी कहते हो और मेरा जन्म और मेरी मृत्यु भी तय करते है। मेरी स्थापना भी तुम्हीं तय करते हो और मेरा विसर्जन भी। ऐसा लगता है जैसे मैं तुम्हारी माँ नहीं, तुम मेरे जनक हो। इस मंडप में मैं वैसे ही बैठी हूँ, जैसे तुम्हारी माँ घर भर की प्रताड़ना सहकर देहरी पर बैठी रहती है।

-मेरी बात पर मत जाओ,मेरी भावनाओं को दखो माँ!

-तुम्हारी भावनाएँ ही तो देख रही हूँ पुत्र।

-अगले बरस तो फिर आओगी न!

-यह भी मैं कहाँ तय करती हूँ। यह तो तुम्हारे मोहल्ले का चंदा तय करेगा। जैसा तुमने कहा था मालामाल जी तय करेंगे। विराजोगे तो स्थापित हो जाऊँगी। विस्थापित करोगे, विस्थापित हो जाऊँगी।

-ऐसी बात करके जाते-जाते हम लोगों को रुलाओ नहीं माँ!

-चलो अच्छा बता दिया तुमने कि तुम्हें रोना भी आता है। मैं तो समझ रही थी कि तुम्हें केवल रुलाना आता है।

-अच्छा बताओ माँ तुम्हें किस नदी में प्रवाहित करें।

-तुम तो मुझे ऐसे विसर्जित कर रहे हो, जैसे राजा फाँसी देते समय अंतिम इच्छा पूछ रहा हो। ज्यादा कष्ट मत करो। जो नदी-नाला सबसे पास हो, उसी में फेंक दो। फेंकने के बाद पीछे मुड़कर मत देखना क्योंकि किसी नाले में इतना पानी नहीं है कि मैं पूरी की पूरी डूब जाऊँ। पीछे मुड़कर देखोगी तो तुम्हें ऐसा लगेगा, जैसे मैं तुम्हारा पीछा कर रही हूँ।

(विसर्जन यात्रा पर जयकारों का नाद तेज हो गया था। माँ की सिसकी जयकारों में उसी तरह खो गई थी, जैसे दिल्ली में कलावती।)

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

माँ-भक्त संवाद-तीन

चाँद पर पानी

-देखा, तुम लोग यहाँ पूजा-पाठ और नाच-गाने में लगे रहे, वहाँ चंद्रयान ने चाँद पर पानी खोज लिया। तुम्हारे भारत देश के वैज्ञानिकों ने कमाल कर दिया।
-माँ! आप भी कैसी बातें करती हैं। क्या हम लोग आपकी महिमा से परिचित नहीं हैं। भले वह चंद्रयान है, लेकिन उसने चाँद पर पानी नवरात्रि में ही खोजा। तुम जो चाहे करवा दो। हम लोगों को कुछ शक्ति दो। हम लोग धरती पर पीने का पानी खोजते-खोजते ही चंद्रयान बने हुए हैं। जिंदगी का यान पुर्जे-पुर्जे बिखर रहा है और साफ पानी दूर भाग रहा है।
-तुम लोग साफ पानी के लिए भटकते ही क्यों हो? बचपन से ही तो गंदा पानी पी रहे हो। कुएँ का पानी पिया, जिसमें बगीचेभर की पत्तियाँ गिरी पड़ी थीं। तालाब में नहाया और उसका पानी भी पिया। गाँवभर के ढोर उसमें नहाते थे। गोबर करते थे। जिस नदी का पानी पिया, उसमें शहर का गटर गिरता था। फिर नलों में जो पानी आया, वह सीवरेज लाइन से जुड़ा हुआ था। तुम्हारी आँतें गंदे पानी से ही काम करेंगी। साफ पानी पिओगे, कितने दिन जिओगे।
-माँ! हम लोग तो अभी भी उसी पानी से जिंदगानी चला रहे हैं। वह तो तुम्हारे भोग के लिए साफ पानी तलाशते रहते हैं। हम नहीं चाहते कि तुम्हारा भोग गटर के पानी से लगे। बोतल बंद पानी भी चढ़ाकर हम पाप नहीं मोल लेना चाहते। अगर तुम्हें गटर अथवा बोतलबंद पानी पसंद हो तो हमें समर्पित करने में कोई दिक्कत नहीं। पानी की जगह 'कोक' से काम चल जाए तो और अच्छा, क्योंकि धीरे-धीरे पानी की बोतल 'कोक' से महँगी होती जा रही है। जून की तपन में तो दूध और शराब भी पानी से सस्ते मिल जाते हैं। हमारी धरती का पानी उतरता जा रहा है, कुछ तो पानीदार करो माँ!
-देखो भक्तों! मैं तुम्हें शक्ति दे सकती हूँ, भक्ति दे सकती हूँ, ज्ञान दे सकती हूँ, दया दे सकती हूँ, चाहो तो धन भी दे सकती हूँ। पानी देना मेरे वश में नहीं है। सृष्टि में जो व्यवस्था बनी है उसमें पानी पेड़ ही देंगे। तुम लोग धरती पर पेड़ लगाओ, पानी अपने आप आएगा। अधिक रहेगा तो साफ भी रहेगा।
-माँ! हम भारतवर्ष के लोग अरब से खरब हो रहे हैं। अगर धरती पर पेड़ लगाएँ तो आदमी को कहाँ बसाएँ। पेड़ काट-काटकर तो रहने के लिए जगह बना रहे हैं। अपनी संतानों को तो धरती पर आने से हम हम रोक नहीं सकते। पेड़ काट सकते हैं, अतः काट रहे हैं। औलादें नहीं आएँगी तो तर्पण कौन करेगा, गया कौन ले जाएगा? तर्पण नहीं हुआ और गया नहीं गया तो मोक्ष कैसे मिलेगा? मरने के बाद पेड़ों पर घट ही तो बाँधते हैं। उसे तो बिजली के खंभे पर भी बाँध देंगे। एक बात और माँ! हम लोग हैं, इसीलिए आप भी हैं, वरना न आप न आपका ज्ञान।
(बेटों के इस कथन के बाद माँ के पास बोलने को कुछ नहीं था। वे लगभग निरुत्तर हो गईं।)

बुधवार, 23 सितंबर 2009

माँ-भक्त संवाद-दो

-भक्तों ! तुम्हारी दृष्टि में नवरात्रि के नौ दिनों में भक्ति क्या है?
-चंदा इकठ्ठा करना, आपकी मूर्ति विराजना, गाना-बजाना करना, गरबे-डिस्कों अदि के शानदार आयोजन करना, खीर-पूड़ी की अच्छी परसादी बाँटना, समापन पर अच्छा बड़ा भंडारा करना, मूर्ति विसर्जित करने के लिए गाजे-बाजे के साथ जाना, आपकी प्रतिमा को नदी में प्रवाहित कर देना और फिर बचे हुए चंदे से थोड़ा-बहुत पीने-खाने का आयोजन कर लेना। इस नवधा भक्ति के बाद थकान उतारना भी तो जरूरी है माँ।

-भक्तों! मेरी आरती बिना डीजे के नहीं हो सकती क्या?
-पड़ोसी पांडाल में देखा है कितना आधुनिक डीजे बजता है। वहाँ तो मुम्बई से भजन गाने वाली और गरबा करने वाली हिरोइने भी आई हैं। सुना है कुछ बार बालाएँ भी हैं। गुजरात और बंगाल से भी हिरोइनें आती हैं। लोकल सारी सुंदर युवतियाँ भी उसी पांडाल पर जाकर नृत्य करती हैं। वो तो अपने पांडाल में घुसने की भी फीस लेता है। इसके बाद भी वहाँ भीड़ उमड़ती है। पीने-खाने का कार्यक्रम भी रोज होता है। उसके मुकाबले तो अपना डीजे कमजोर ही है माँ।

-और कल झगड़ा किस बात को लेकर हुआ था?
-क्या कहूँ माँ, कल कुछ बेधर्मी इधर आ गए थे। अब जिनके सुल्तानों ने हमारे मंदिर तोड़े, हमारे धर्म को प्रदूषित किया, हमें सालों तक गुलाम बनाया, उनको हम कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं। हम तो चाहते हैं कि उनको इस देश से ही बाहर निकाल दें, लेकिन सरकारें उनके तलवे चाट रही हैं। हम लोग इतना बड़ा आयोजन भी तो इसीलिए करते हैं कि हमारी ताकत देखकर उनकी फट जाए। कभी-कभार शस्त्रपूजा भी तो इसीलिए करते हैं। इसके बाद भी उनकी हिम्मत देखिए कि हमारी गली में घुस आते हैं। कल लगी-छनी का मामला था हो गई जूतम-पैजार।

-तुम लोग इतना हल्ला करते हो, बच्चे पढ़ नहीं पाते। बीमार लोग परेशान होते हैं।
-पढ़ने-लिखने से क्या होगा माँ। सिर्फ समय की बरबादी। हम लोग पढ़- लिखकर देखो वर्षों से तुम्हारी सेवा कर रहे हैं और जो लोग बिना पढ़े-लिखे हैं वो सरकार की सेवा कर रहे हैं। हम लोग चार-चार पैसे के चंदे में अपनी उम्र खपा रहे हैं। उनके घर करोड़ों का चंदा पहुँच रहा है। अब ज्यादा न कहलाओ माँ! तुम भी तो उन्हीं का भंडार भरती हो। हम लोगों की जिंदगी घिस गई सुबह-शाम की रोटी में मुश्किल हो रही है। रही बात बीमारों की तो महँगाई और जहालत में मरने से अच्छा है कि दिल-गुर्दा फेल होने से ही मर जाएँ।

-अच्छा यह बताओ कि इन नौ दिनों में अगर तुम लोग मेरी स्थापना कर यह आयोजन नहीं कर रहे होते तो क्या करते?
-माँ! तुम आजकल कितने प्रश्न करने लगी हो, लगता है अब तुम भी अंतर्यामी नहीं रहीं। पेट पालने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही है। कानून करने देता है तो कानून के भीतर करते हैं, नहीं करने देता तो कानून के बाहर करते हैं। वैसे अच्छा यह है कि अपने देश में कानून नाम की कोई बाधा नहीं है। अपने-अपने कायदे हैं-अपने कानून हैं। इसलिए जरूरत पड़ने पर सब कानून के दायरे में आ जाता है। सरकारें और कानून काम नहीं देते इसलिए हम कानून को ही काम देते हैं।
(जवाब सुनकर माँ एक बार फिर उदास हो गईं)

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

माँ- भक्त संवाद- एक

-भक्तों तुम लोग क्यों नाच-गा रहे हो?-माँ आज हम लोगों का दिल प्रसन्न है, हम नहीं नाच रहे हैं, मन ही मयूर है।
-मन मयूर होने की कोई खास वजह भक्तों?-नवरात्रि है तो आपके चरणों में लोट रहे हैं।
-इसके पहले गणेशोत्सव में भी आप लोगों के नृत्य से सड़कें भरी थीं, लोगों का सड़कों पर चलना मुश्किल था।
-तब गणेशजी के चरणों में लोट रहे थे।
-इसके पहले मालामालजी के चुनाव में भी तो खूब झूम-झूमकर नाचे थे।
-तब उनके चरणों में लोट रहे थे। उनकी वजह से ही तो सारा लाव-लश्कर है माँ। आपकी मूर्ति और इस आयोजन के लिए भी तो वही पैसे खर्च करते हैं। धन को हाथ का मैल मानकर चार-छः लाख रुपए झाड़ देते हैं।
-जब अमेरिका से विश्वसम्राट आए थे तब?
-माँ! उनके चरणों में तो सारी दुनिया लोट रही है, फिर अपनी क्या औकात? नाचें-गाएँ नहीं, उनके चरणों में लोटें नहीं तो अपने सम्राट की छवि काली कोठरी में चली जाएगी। अमेरिका से माल आना बंद हो जाएगा और वे हमें महँगाई का एक और शाप दे देंगे। हम लोग घर बैठे मर जाएँगे।
-अच्छा भक्तों! यह बताओ, तुम लोग किसके चरणों में नहीं लोटते?
-माँ! आप तो सब जानती हैं, फिर भी बता दूँ। जो भी अपने को धन-दौलत दे सके, नौकरी-चाकरी दे सके, ट्रांसफर-प्रमोशन करवा सके, छोटे-मोटे चुनाव का टिकट दिलवा सके। उसके चरण में हमारा आचरण समर्पित है। दुनिया में कोई चरण हमारे लिए अछूत नहीं है। अपने चरण में लोट नहीं सकते इसलिए वह बचा हुआ है।


(बेटों के जवाब पर माँ को शर्म जैसा कुछ महसूस हुआ और आगे की सारी जिज्ञासाओं को उन्होंने उसी तरह पचा लिया, जैसे कभी शिव ने जहर पचाया होगा। उन्होंने यह मान लिया कि उन्हें बेटों के बारे में सब पता है।)

शनिवार, 19 सितंबर 2009

दादा का जीवन सादा हुआ

अपने दादा भी वहीं से आए हैं, जहाँ से बड़े-बड़े नेता आते हैं। दादा ने पढ़ाई-लिखाई भी वहीं से की है जहाँ से अपने महान देश के महान प्रधानमंत्रियों ने की है। उनका खानदान भद्र है, उच्च है, महान नेताओं का है। वे उस राजनीतिक दल से आते हैं, जहाँ लोकतंत्र का मतलब हुकुम है और आजादी के बाद से जिसका ज्यादा समय सरकार चलाने में ही बीता है। वे कैमरे को बहुत ही मादक-मोहक मुस्कान समर्पित करते हैं। उनकी रगों में दौड़ने वाला खून गंगा-यमुना और पूरब-पश्चिम का पवित्र संगम है। गाँव में हिंदी और शहर में अंग्रजी बोलते हैं। गरीबों को गले लगाने की कला सीख रहे हैं। दादा यूँ तो कभी बूढ़े नहीं होंगे लेकिन इन दिनों जवानी का उद्घार कर रहे हैं। जवानों में जोश भर रहे हैं। आम (आदमी) के घर आम और खास के घर के खास बनकर जा रहे हैं। दादा को अपना भविष्य प्रधानमंत्री की कुरसी पर नजर आता है इसलिए वे हर हाल में भारत का भविष्य सुधारने में लगे हैं। दादा को बच्चा कहने वाले गच्चा खा चुके हैं। दादा मंत्री नहीं हैं फिर भी मंत्रियों से बड़े हैं। सारा आर्यावर्त जानता है कि दादा प्रधानमंत्री बनकर ही अच्छे लगेंगे, इसके बाद भी वे अभी प्रधानमंत्री बनने में रुचि नहीं दिखा रहे हैं।

दादा जब सात समंदर पार अध्ययन के लिए गए थे, तब यह मानकर नहीं गए थे कि उन्हें राजनीति के दलदल में कमल बनकर खिलना पड़ेगा। वे इस दलदल को स्पर्श करने के लिए जरा भी उत्सुक नहीं थे, लेकिन इस देश की गरीब जनता की मान-मनुहार के आगे झुक गए और सेवा करने निकल पड़े। वे जनता की सेवा भी इस तरह करते हैं जैसे जनसेवा में ही एमबीए हों। दादा गरीबों के इतने हितैषी हैं कि संसद से लेकर सड़क तक केवल गरीबों के बारे में ही बोलते और चिंतन करते रहते हैं। गरीबी पर बात करके वे इस देश की अर्थव्यस्था को औंधेमुँह नहीं गिराना चाहते। वे कोई आर्थिक क्रांति, सामाजिक क्रांति, राजनीतिक क्रांति करने के इच्छुक नहीं हैं, उनका राजनीति में आना ही एक महान क्रांति हैं। आज की तारीख में किसी माई के लाल में दम नहीं है कि उनके जैसा सेवक बन सके।

दादा का संपूर्ण कुल ज्ञानी था। वे भी दूर-देश से पढ़कर आए हैं अतः पर्याप्त ज्ञानी हैं। भारत देश को अमेरिका का वैभव देना चाहते हैं। इसलिए वहाँ की आर्थिक नीतियों को लागू करने के पक्षधर हैं। जिस भी शर्त पर कर्ज मिले लेकर देश की लंगोट को टाई में बदल देना चाहते हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ लाना चाहते हैं, जिससे गरीबों को रोजगार मिल सके। अभी दादा पूरे पावर में नहीं हैं वरना अमेरिका इधर होता, भारत उधर। उनके ज्ञान से ज्ञानीजन इतना आतंकित हैं कि वे न तो कोई ज्ञान बाँट पा रहे हैं और न ही नए ज्ञान का सृजन कर पा रहे हैं। ज्ञान का ही कमाल है कि सारे बूढ़े ज्ञानी उनकी जय-जयकार कर रहे हैं। वे अपनी मुक्ति दादा में तलाश रहे हैं।

पूरा देश दादा को समझने में लगा है और दादा इस देश को। दादा को यह देश अबूझ पहेली लगता है और देशवासियों को दादा। देशवासी अभी दादा का लाव-लश्कर, उनका ऐश्वर्य, उनके खजाने को ही समझ रहा था कि दादा सादगी पसंद हो गए और उन्होंने सादगी को समझना शुरू कर दिया। सादगी की शुरुआत उन्होंने इस तरह से की कि दिल्ली से हवाई जहाज पर बैठतेऔर सीधे गरीब की कुटिया में उतरते। गरीब कभी हवाई जहाज देखता और कभी दादा को। दादा को देखकर गरीब गरीबी भूलने की कोशिश करता। दादा धीरे-धीरे गरीबों में इतना रम गए कि उन्होंने हवाई जहाज भी छोड़ने का फैसला कर लिया। दादा ने तय किया कि वे अब रेल में चलेंगे। देशवासियों से मिलने रेल से ही जाएँगे। दादा यह जान गए है कि यह देश हवाई जहाज पर नहीं रेल पर चलता है। रेल आम आदमी को इस तरह से प्रिय है कि लोगों को जब मरना भी होता है तो उससे कूदकर मरते हैं, उससे कटकर मरते हैं। हवाई जहाज ने भले ही लोगों को मार दिया हो, आज तक कोई उससे कूदकर नहीं मरा। अतः उन्होंने रेल का एक वातानुकूलित कक्ष किराए पर लिया है। कुछ लोग उनकी इस वातानुकूलित यात्रा से नाराज हैं। उन अज्ञानियों को क्या बताएँ कि दादा जिस तरह देश को समझ रहे हैं उसी तरह रेल को भी समझ रहे हैं। जिस दिन उनको पता चला जाएगा कि रेल में आम आदमी स्लीपर क्लास और सामान्य डिब्बे में चलता है, उस दिन वे भी उसी श्रेणी में चलने लगेंगे। आखिर महात्मा गाँधी को भी तो ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका में खूब धक्के खाने के बाद सामान्य श्रेणी में चलने और आम आदमी बनने का आत्मज्ञान प्राप्त हुआ था।

दादा रेल पसंद हो गए हैं यह जानकर सारे देश के लोग भले ही परम प्रसन्न हों कि एक दिन वे भी अपने युवराज को अपने साथ सफर करता पाएँगे, लेकिन यह नादान भीतर से बुझ सा गया है। दादा अगर पैसे बचाएँगे तो गले तक भरा उनका खजाना खर्च कैसे होगा। न तो दादा भंडारा करने वाले हैं और न ही हम जैसे मुद्रा राक्षसों को बाँटने वाले। दादा का बचा हुआ पैसा इस देश के कैसे काम आएगा। विमान कंपनियां भी घाटे में चली जाएँगी। अपने को एक चिंता यह भी सता रही है कि खुदा-न-खास्ता दादा सामान्य श्रेणी में सफर करने लगे तो अपनी सवारी कैसे निकलेगी। क्या अपने को बैलगाड़ी के पहिए दुरुस्त करवाने पड़ेंगे। जितना सोचते हैं चिंता उतनी होती है, राहत मिलती है तो केवल इसी बात से कि दादा हैं। सब ठीक कर देंगे। अपना बचपना नहीं छूटता, इसलिए एक सवाल रह-रहकर हूक मारता है कि दादा ने अगर वायुमार्ग का पूरी तरह से त्याग कर दिया तो अपने ननिहाल कैसे जाएँगे। हम भारतवासी कभी नहीं चाहेंगे कि दादा का ननिहाल उनसे छूटे इसलिए आज नहीं तो कल उन्हें मना लेंगे और वे विमान पर सवार होंगे।

दादा के परदादा किसी दूसरे देश में अपना कोट धुलवाते थे, यह दादा के सादगी सिद्घांत के विपरीत है। अतः दादा अंतः वस्त्र से लेकर कुरता-पायजामा और कोट-पैंट तक सब कुछ अपने देश में ही धुलवाते हैं। देश के स्वास्थ्य के लिए दादा को छप्पन भोग खाना पड़ता है, कमाल देखिए कि दादा ने वहाँ भी सादगी दिखाई है और चम्मच आदि का इस्तेमाल बंद कर दिया है। अब वे आम आदमी की तरह हाथ में कौर लेकर भोजन ग्रहण करते हैं। देश दादा की तरफ आँखें फाड़कर इस उम्मीद से देख रहा है कि वे अनाथ जनता की तरह किसी कन्या का हाथ भी थामें, वरना आने वाली पीढ़ियाँ प्रधानमंत्रियों के लिए तरसेंगी। उच्च विचार वाले सीधे-सादे नेताओं के दर्शन दुर्लभ हो जाएँगे। सादगी डायनासोर की तरह विलुप्त हो जाएगी।

न दादा का कोई जोड़ है, न कोई तोड़। जब तक दादा हैं, यह देश है। देश के उज्जवल भविष्य के लिए दादा के उत्तम स्वास्थ्य की प्रार्थना करते हैं। नमक-रोटी (अब दाल-रोटी नहीं क्योंकि वह भी छप्पन भोग की श्रेणी में आ गया है) खाकर जीवित रहें और लंगोट से तन ढ़का रहे इसलिए हम दादा की सादगी पर कुर्बान हैं।

रविवार, 13 सितंबर 2009

पितृपक्ष में हिंदी का एक दिन

पितृपक्ष के पंद्रह दिनों में एक दिन अपनी हिंदी का भी होता है। पुरखों के साथ अपन अपनी 'राष्ट्रभाषा' का भी स्मरण (तर्पण) करते हैं। पुरखों ने अपने वंशजों पर अनगिनत उपकारों में से एक उपकार यह भी किया है कि अपने साथ राष्ट्रभाषा का स्मरण भी नत्थी कर दिया है। उन्हें मालूम था कि हमारे पुत्र-पौत्र आने वाले दिनों में इतने व्यस्त हो जाएंगे कि भाषा-वाषा को याद नहीं रख पाएंगे। अगर जमीन-जायदाद की लालच में किसी तरह पुरखे याद रह गए तो इसी के साथ बोली-भाषा का आयोजन भी निपट जाएगा। उनका शुभ विचार आज हमारा उद्घार कर रहा है और हम श्राद्घ पक्ष के बीच में एक दिन 'हिंदी दिवस' मना रहे हैं। पुरखे आश्वस्त रहें, जब तक हम उन्हें पानी देंगे तब तक हिंदी को भी टीकते-पूजते रहेंगे।

सच मानिए अश्विन माह की अंधियारी में हमें पुरखों और 'राष्ट्रभाषा' की रह-रह कर याद आती है। पुरखे हमारा अर्ध्य और श्राद्घ लेने के लिए घरों के आसपास मंडराते हैं और बेचारी 'राष्ट्रभाषा' सरकारी दफ्तरों के आसपास मुक्ति की कामना लिए लार टपकाती है। जिसने जीभ को हिलने-डुलने लायक बनाया, रोजी-रोटी दी, कचहरी से लेकर संसद तक चलाया, वही अपनी आबरू के लिए राजपथ पर रिरियाती है। अपने बोलने का और लिखने का अभ्यास देखकर जब वह कराहती है तो बहुतेरे दफ्तर उसके आंसू पोंछते हैं। कहीं निबंध लिखे जाते हैं, कहीं कविता, कहीं भाषणबाजी तो कहीं बतोलेबाजी के आयोजन। यह देख हिंदी अपनी मुक्ति के लिए आश्वस्त है।

जब तक पुरखों की संपत्ति पूरी तरह से अपनी नहीं होती, तब पितरों का तर्पण भी बहुत तन्मयता से होता है। पूरे पंद्रह दिन पानी से लेकर खीर तक सपर्पित होती है। एक-एक कर्म कर्मकांड की किताब से निकलता है। जैसे-जैसे संपत्ति पर अधिकार पुख्ता होता जाता है, पुरखे सिर का बोझ होने लगते हैं। फिर सारा घर मिलकर तय करता है कि पितर घर में परेशान हो रहे हैं इन्हें 'गया' पहुंचाओ। अब इनकी मुक्ति वहीं होनी है। अपनी हिंदी का हाल भी वैसा ही है। हिंदी पढ़कर जब तक अंग्रेजी ठाठ नहीं मिलता तब तक वह मातृभाषा है और जब गजरथ सज गया तब चिंदी-चिंदी उसका तर्पण होता है। जायका जिस तरह से बदल रहा है तो एक दिन पिज्जा-बरगर से पुरखों के पिंडे बनेंगे और अंगरेजी हिंदी को अमर होने का वरदान देगी।

अपनी मां-बहनों और भोली-भाली जनता की तरह अपनी 'राष्ट्रभाषा' बहुत जल्दी प्रसन्न होती है। वह तो इसी बात से प्रसन्न है कि एक दिन ही सही उसकी व्यस्त औलादें उसे याद तो कर लेती हैं। उसकी महानता का गुणगान करती हैं। उस पर कुर्बान होने की कसम खाती हैं। वह इसी बात पर गदगद है कि उसने अंगरेजी की तरह दुनिया में किसी को गुलाम नहीं बनाया। अंगरेजी ने भले ही सारी दुनिया को गुलाम बना लिया हो, लेकिन उसका दिवस मनाने वाला कोई नहीं। कम से कम हमारी औलादें कृतघ्न नहीं हैं। सारी संपत्ति देकर पितर अंजुरीभर पानी से प्रसन्न हैं और हिंदी 'दिवस' की पप्पी से खुश।

हम अपनी हिंदी से केवल प्यार नहीं करते, उसके प्रति श्रद्घा ही नहीं रखते, श्राद्घ (हिंदी) दिवस पर उसे याद ही नहीं करते, बल्कि उसका लोहा भी मानते हैं। अंगरेजी की नाजायज संतानें उसकी आत्मा का भी वध करना चाहती हैं, लेकिन वह तोप-तलवारों को बेअसर करती जा रही है। बोलचाल में अंग्रेजी आई तो उसने छकाया। हिंदी अखबारों के पन्नों पर घुसने लगी तो उसने छकाया, अर्जियों-फाइलों में घुसी तो भी उसने अपने को बचाया। उसकी काया का अंतिम संस्कार भले हो गया हो, लेकिन आत्मा का बाल भी बांका नहीं हुआ है। तभी तो हम सितंबर में चौदवी का हिंदी चांद देखते हैं। इस समय हिंगलिश का झोंटा पकड़कर नोंच रही है। ईश्वर उसे ताकत दे।

देखिए भाई! अपन ठहरे प्रबल आशावादी। कोई कितना भी कहे कि हिंदी के कबूतर को अंगरेजी के गिद्घ नोच डालेंगे, लेकिन अपने से ऐसा नहीं माना जाता। जब तक लोकतंत्र को हिंदी के वोट की बोटी चाहिए यही गिद्घ कबूतर की रक्षा करेंगे। जब तक हिंदी का इतना बड़ा बजार बना रहेगा, गिद्घ लार गुटककर भी कबूतर को जीने देगा। हम पूरे पंद्रह दिन पितरों का तर्पण करेंगे और हिंदी का स्मरण करेंगे।