सोमवार, 9 नवंबर 2015

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

बिस्किट चला तैराक बनने

आपने भी पहली बार सुना होगा यह अचरज। जैसे ही पैकेट खोला बिस्किट खड़ा हो गया प्लेट पर...

'मैंने स्वीमिंग सीख ली है...मैं तो तैरूँगा तुम्हारी गर्म चाय के कप में।'
क्या बोलता उस सेवड़े से कि तेरे जैसे कितने तैर चुके हैं और जाके तलहटी के तलवे चाट रहे हैं। एक बार प्याली में कूदेगा तो सीधा चम्मच से बाहर निकलेगा। शक्ल ऐसी हो जाएगी कि लोग नज़र बचाने लगेंगे और नाक दबाने लगेंगे। प्लेट में पड़े-पड़े खनकता रह तो लगेगा तुझे तैरना भी आता है और तरना भी। चाय में तैरने की तो छोड़, चाय की बूँद के नीचे भी आया तो प्लेट में चिपका रह जाएगा।

सेवड़ा पोंछकर खड़ा हो गया...' मैं पार-ले जी हूँ। मुम्बई के विले पारले से आया हूँ। जुहू चौपाटी घूमी है और समुन्दर में तैरना सीखा है। मैं किसी प्याले-प्याली से नहीं डरता...' फिर समझाया 'बेटा, जब बाप पानी दिखाकर घर लौटा लाए तो उसे तैरना नहीं कहते। तैरने के लिए ये सिंके हुए मैदे का बदन काम नहीं आता। चाय में तैरने का मतलब आग है आग के दरिया में कूदना। जब विले पारले में सिंके थे, तब पानी के साथ मिलकर पहुँचे थे ओवन में। अब उघाड़े बदन चाय स्नान करोगे तो बड़े अस्पताल की बर्निंग यूनिट में दाख़िला भी नहीं मिलेगा। प्लेट में पड़े-पड़े ही कराहते रहोगे।'  जैसे-तैसे पिंड छूटा।

फिर एक दिन आ गया बिलकुल काला-कुट्ट...तोंद में सफ़ेद क्रीम भरे। बोला- 'मैं ओरियो हूँ। मेरी बहुत डिमांड है। बच्चे तो मेरी ब्यूटी पर जान छिड़कते हैं। पानी में कितना भी नहा लूँ, मेरा रंग नहीं उतरता। चाय में घुलता भी नहीं। अब तो मैं तैरूँगा।' मैंने हाथ में उठाया उस कॉलिये को,  उसकी मुंडी प्याली की तरफ़ घुमाई और कहा- 'एक बार इस चाय का रूप तो देख! दूध में नहाकर आई है। कैसी गोरी झक हो रही है। तूने अपनी शक़्ल देखी है आईने में कौवे के कपूत! लोग क्या कहेंगे कि गंगा में डूबकर पापी ने ख़ुदकुशी कर ली। मरना है तो काली चाय में मर।' जाने क्या समझ में आया और मुँह उतारकर चला गया।

अगली बार मिला तो पूरे बदन से पीत झड़ रहा था। मैंने सोचा पीलिया का मरीज़ हो गया है, अब कम से कम तैरने की बात नहीं करेगा। मूली-गन्ना की तलाश में निकला होगा, ले-देकर निकल लेगा। लेकिन उसे कहाँ रहाई पड़ती! बोला-' मैं क्रैकजैक हूँ। मुझे तो दारू में भी तैरा दो तो तैर जाऊँ। कितनी बार मदिरालय जा चुका हूँ। आज तुम्हारी चाय में तैराकी कर के रहूँगा।' लगा गेलों के आगे गला ख़राब करने का मतलब नहीं। उससे कुछ बोलता उसी बीच याद आई कि मैं टॉमी के लिए बिस्किट ख़रीदना फिर भूल गया। भोंकेगा तो क्या खिलाएँगे!!!

जब चाय ख़त्म हुई तो तब पता चला कि बहादुरी बताते-बताते साहब चुपके से कूद गए थे प्याली में...ऐसे समेटना पड़ा जैसे बाढ़ के बाद नदी के घाट की गाद समेटनी पड़ती है।
आमीन!!!
(इस व्यंग्य का मनुष्यों से कोई सम्बन्ध नहीं।)

#ओम द्विवेदी

गुरुवार, 27 मार्च 2014

नाटक जारी रहेगा मेरे दोस्त...!

परदे के पीछे हैं अभी भी कई किरदार
कई कहानियां लिखी जानी बाकी हैं
कई पात्र अभी भी नहीं जिए गए हैं
कई मुखौटे बनने शेष हैं अभी
स्पॉट लाइट में साकार होना है
अभी भी एक निराकार।

एक पटकथा के लिए
अपने भीतर कई-कई समुद्र मथ रहा है लेखक
निर्देशक को सपने में झकझोरता है अभिनेता
दर्शकों की ताली के लिए अभी भी ज़िंदा है
कलाकारों की भूख।

चाह बाकी है चांद छूने की
नीरस समय में नौ रस होने की
मंच पर रंगों की भूमिका निभाने की
भरत मुनि के साथ वेद पांचवां पढ़ने की
नाटक जारी है मेरे दोस्त
नाटक जारी रहेगा मेरे दोस्त...!

सभी रंगकर्मियों और रंगकर्म को चाहने वालों को मेरा सलाम!
-ओम द्विवेदी

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

रात बना ही लेती है एक सूरज

जैसे समंदर
बादल बनाता है चुपके-चुपके
कुम्हार गुनगुनाते हुए
मिट्टी को बना देता है घड़ा
गाय घास को
बहुत ही खामोशी से दूध बना देती है
भोर आते-आते तक
रात बना ही लेती है एक सूरज

जैसे खाद बिना ढिंढोरा पीटे
फसल को करती है हरा
रोटी बिना मुनादी किए
भूख को बदलती है तृप्ति में
जैसे परिंदे बीजों को
सहज ही ले जाते हैं मरुस्थल में
वैद्य बीमारी को बनाता है स्वास्थ्य
लोहार लोहे में बना देता है धार

मैं अपने सबसे बुरे दिनों को
सबसे अच्छा बनाने में लगा हूं।
-ओम द्विवेदी

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

फिर भी है उनके ज़िन्दा रहने की उम्मीद

जो बोलेगा 
काट ली जाएगी उसकी जीभ
जो देखेगा
उसकी आँखें फोड़ दी जाएंगी
जो सुनेगा सच
पारा पिघलाकर
डाल दिया जायेगा कानों में।
जो सीधी करेगा रीढ़
उसके कंधे पर
लाद दिया जाएगा पहाड़
खड़े होने की कोशिश भी की 
तो तोड़ दिए जायेंगे पांव।
मुठ्ठियाँ तो तानना ही मत हवा में
नहीं तो दोनों भुजाएं
मिल जाएँगी किसी बूचडखाने में
सिर भी अगर रखना है सलामत
तो झुकाए ही रखना।
यह आम को इमली
और इमली को आम कहने का समय है।
यह तलवार लेकर लड़ने का नहीं
तलवार के व्यापार करने का समय है।

पर ज़िंदगी रोज़ मरना भी नहीं
मरने तक ज़िन्दा रहना है।
रणभूमि में मारे गए हैं वे भी
जो जीने की लालच में 
बने रहे दर्शक और युद्ध को
समझते रहे मनोरंजन।
उनके ज़िन्दा रहने की उम्मीद फिर भी बनी रही
जिन्होंने शौकिया ही सही
उठा ली तलवार।
‪#‎ओम‬ द्विवेदी

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

बेआवाज़ की आवाज़ कौन

न हंसते बन रहा है न रोते
हम न जागते दिखाई दे रहे हैं न सोते
देश के करोड़ों लोगों की तरह
मेरे सामने भी सच परदे के पीछे है।
कौन है जो द्रोपदी की तरह
सियासत की चीर खींचे हैं।
'आप' के साथ उग रहा है एक सूरज
या डूब रहा है।
इस जन गण का ख़ून खौल रहा है
या वह अपने आप से ऊब रहा है।
यह जनतंत्र तूफानों और
सुनामियों से बदल रहा है
या हमारे भोलेपन को
बड़ी चालाकी से छल रहा है।
सबसे ऊंची मीनार पर
झूठ सच की शक्ल में खड़ा है
या फिर भरे चौराहे पर
सच झूठ बोलने पर अड़ा है।
जिन्हें सुनना पाप, वे चीख़ रहे हैं
जिन्हें सुनना पुण्य, वे मौन हैं।
समझ में नहीं आ रहा
यहां बेआवाज़ की आवाज़ कौन है?
-ओम द्विवेदी

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

यहां पल-पल का पर्व है प्यार

ताजमहल की तरह हमारे शहर में मोहब्बत के मकबरे भले नहीं हों, लैला-मजनू, सीरी-फरहाद जैसी दीवानगी का पागलपन भले ही किस्से-कहानियां न बना हो, भले ही संत वेलेंटाइन जैसे किसी फकीर ने यहां इश्क के नारे नहीं लगाए हों...लेकिन महानगर की तरह दिखने वाले इस गांव के पोर-पोर में प्यार है, अपनापा है। यह प्रेम का अजब-गजब घाट है। यहां इश्क केवल महबूब और महबूबा के हुस्न की नक्काशी पर खत्म नहीं होता। यहां कबूतर प्रेम की चिठ्ठी केवल प्रेमिका के आंगन में गिराकर नहीं लौट आता। यहां प्रेम का दीया केवल एक देहरी पर जलकर रोशनी से अपना दामन नहीं झाड़ लेता। यह शहर प्रेम की पंगत है, नेह का भंडारा, इश्क की इबादतगाह, मोहब्बत का प्रकाशोत्सव।

यहां जिसे लुटाना आता है वह अपना खजाना बिना नफा-नुकसान के लुटाता है और जिसे लेना आता है वह अपने दामन को चादर की तरह फैला देता है सड़क पर। जिसे बांटना आता है वह घड़े में भरा अमृत बांटता जाता है और घड़ा भरता जाता है दोगुनी रफ्तार से। जिसे छकना आता है वह छकता जाता है लंगर की तरह। मियां गालिब की शायरी की तरह यहां इश्क कोई मुश्किल काम नहीं है, जो आग का दरिया हो और तैरने में जल जाने का खतरा। यहां तो प्यार पल-पल का पर्व है। मन का महोत्सव। रंगपंचमी पर रंगों का मेला है। रंगों के समंदर में डूबते जाओ और एक होते जाओ। यहां इश्क अनंत चतुर्दशी की झांकियां हैं, देखते जाओ और भूले-बिसरों से गले मिलते जाओ। यहां मोहब्बत हरतालिका तीज की रात है, राजवाड़े पर नाचते जाओ-झूमते जाओ। यहां प्रेम सराफे के ओटले पर स्वाद लुटाती रातें हैं, खाते जाओ और ऊंगलियां चाटते जाओ।


यहां इश्क इतना मासूम है कि बेटे को जब हिचकी आती है तो मां आंचल का एक धागा उसके सिर पर रख देती है, हिचकी गायब। इतना भोला है कि सूरज की किरणों को रूमाल में बांधकर ले जाना चाहता है रात तक। यहां प्यार इतना जवान है कि पूरी धरती को हथेली पर रखकर दौड़ लगाना चाहता है। इतना प्रौढ़ कि न तो तूफानों का खत पढ़कर डरता और बिजलियों की चमक से खौफजदा होता। यहां प्यार गर्मी में अमराई की छांव है तो ठंड में अलाव। महाकाल और ओंकार से आशीर्वाद मांगती आस्था है तो ईदगाह से गूंजती बरकत और खुशहाली की अजान। यहां प्यार मजहबों की दीवारें तोड़कर कभी खजराने में नाहरशाह वली की दरगाह पर गले मिलता है तो कभी दीवाली और ईद पर एक-दूसरे के घर भेजता है मिठास। यह शहर प्यार में किसी को एक गुल नही, पूरा गुलशन पेश करता है। उसके लिए एक लफ्ज नहीं, एक गीत नहीं, बल्कि पूरा शब्दकोश और महाकाव्य रचता है। यहां प्यार किसी एक देह के लिए जंजीर नहीं है, बल्कि समष्टि की मुक्ति का मार्ग है। एक धर्म है, एक अनुष्ठान, जो मुक्त करता है अपने ही बनाए तमाम कारागारों से। यह शहर मांडू से रानी रूपमती और बाज बहादुर के प्रेम के अफसाने भले सुनता हो, अवंतिका से भेजे गए बादलों पर लिखे कालिदास के प्रेम पत्र भले पढ़ता हो, लेकिन देवी अहिल्या के न्याय और भक्ति के सूत्र कभी नहीं भूलता। यहां की हर सांस प्यार का अनूठा राग है, खुशबूदार है।

-ओम द्विवेदी
 प्रेम दिवस पर नईदुनिया में 

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

आया है चुपचाप वसंत


फूलों ने न तो उसके आने की कोई मुनादी की, हवाओं ने पांव में घुंघरू नहीं बांधे, पेड़ों ने अपना श्रृंगार नहीं किया, सरसों के खेतों ने पीली चूनर ओढ़ ली है, गांवों से ऐसी कोई खबर भी नहीं आई, चोरल के जंगलों में पलाश दहके हैं, ऐसी कोई पाती लेकर कबूतर अभी आंगन में नहीं उतरा। दोस्त की सांसों से चंदन की महक भी गायब है। तितली रूठी-रूठी घूम रही है गमलों के आसपास, फूलों से रंग छीनकर नहीं मल रही है अपने पंखों पर। लापता होते भौरे कहीं इक्का-दुक्का गाते तो हैं, लेकिन भटके हुए हैं सुर और ताल। कोयल ने भी ठुमरी-दादरे का रियाज नहीं किया। जैसे कोई चक्रवर्ती सम्राट फकीर के वेश में किसी गांव में घुसे, ऋतुराज कुछ उसी तरह दाखिल हुआ है शहर में। वसंत आया है, जैसे बदन पर भभूत मलकर कोई संत आया हो।

महाराज को पता हो जैसे कि वे आ रहे हैं अपने उस घर, जहां सदा ही रहता है वसंत। जहां शरद में हवा न डंक मारने लायक सर्द होती और न ग्रीष्म में चांटे मारने लायक तवे की तरह गर्म। इसलिए वे नहीं खड़े हुए आईने के सामने, लाव-लश्कर को नहीं दिया साथ चलने का फरमान। सेनाओं को कह दिया आराम करने के लिए। सुरक्षाकर्मियों को भी सादी वर्दी में रहने का आदेश दिया। कामदेव और समस्त अप्सराओं से कह दिया कि स्वर्ग के बजाय तुम भ्रमण करो बीआरटीएस की आलीशान सड़कों पर, शॉपिंग करो किसी भी मॉल में रुककर। सराफे-छप्पन पर पोहे-जलेबी खाओ, समोसे-कचोरी सूतो। रथ पर नहीं, वातानुकूलित आई-बस में भ्रमण कर यहां के मदनों और रंभाओं को निहारो। मालवा की जिन रातों पर रीझते हैं देवता, तुम भी उसके लिए कुछ गीत लिखो, कुछ छंद रचो।

सच तो यह है कि वह इस बार आया है पराजित-सा, बिलकुल उदास, अपनी ही आत्मा का बोझ ढ़ोता हुआ। उसे पता था कि वह आएगा तो यहां उजड़ा मिलेगा उसका आशियाना। नौलखा के नौ लाख पेड़ों में एक ठूंठ भी नहीं मिलेगी उसे, जहां वह बना सके अपना ठिकाना। पलासिया में टेसू के चिह्न भी नहीं खोजे मिलेंगे, जंगल के सीने में कील बनकर घुस गया होगा शहर। वैध्ाव्य झेलती खान नाम की नदी ने कृष्णपुरा छत्री पर कर ली होगी खुदकुशी। परिंदों को मिल चुका होगा देश निकाला। वह अगर पंचम सुर में गाएगा तो मोटर-कारों और हॉर्न की चीखें दबा देंगी उसका गला। उसे पता था कि अगर वह ऋतुओं के राजा की तरह आएगा तो मार दिया जाएगा बहुरूपिया समझकर। वह जानता था कि यहां लोगों ने अपने-अपने घरों में बना लिए हैं अपने वसंत, इसलिए वह खाएगा ठोकर। जानता था कि अगर वह ढिढोरा पीटकर आएगा तो उसे शेर की तरह रख दिया जाएगा चिड़ियाघर में। कुछ कैमरे में कैद करेंगे तो कुछ पत्थर मारकर परखेंगे उसका स्वभाव। भक्त मंदिरों में बैठाकर पट बंद कर लेंगे और चढ़ाएंगे छप्पन भोग। इसीलिए बिना किसी को फोन किए, बिना अखबारों में इश्तहार छपवाए, बाजारों में बिना पोस्टर चस्पा करवाए, बिना ऊंचे-ऊंचे तोरणद्वार के, वसंत चुपचाप आ गया है सपनों के वन में, वासंती नयन में, वासंती शहर में।
-ओम द्विवेदी 

रविवार, 17 नवंबर 2013

एक ख्वाब, जो 24 साल तक रहा पलकों पर

जैसे कोई बल्ले की क़लम से मैदान के भोजपत्र पर वेदों की ऋचाएं रचता रहा हो...छंद शास्त्र को अनगनित मात्रिक और वार्णिक छंद सौंपता रहा हो...बल्ले की वीणा पर राग-रागिनियां बजाता रहा हो...बाइस गज़ के बीच दौड़ते हुए कथक, कुचीपुड़ी और लावणी को शर्मिंदा करता रहा हो...जिसने बिना-अस्त्र के दिलों पर बादशाहत हासिल की हो...दुनियाभर के क्रिकेटप्रेमियों की धड़कन बनकर धड़कता रहा हो...जिसके हाथ में लकड़ी का छोटा-सा खिलौना तोप बनकर दुश्मनों के किले ध्वस्त करता रहा हो...जिसने शत्रुओं के खेल को अपने देश की आत्मा बना दी हो...जिसका सिर आसमान से टकराता हो, लेकिन पांव ज़मीन में धंसे हों...जिसके आगे एवरेस्ट छोटा दिखे, लेकिन जो कंकरों-पत्थरों को भी सम्मान दे...जिसके लिए पूरी धरती सचमुच में एक परिवार रही हो...जिसने खेल से इतनी मोहब्बत की हो कि रश्क़ करे ताजमहल...वह सचिन रमेश तेंडुलकर ख्वाब बनकर 24 साल तक टिका रहा पलकों पर।

इतिहास ने कितनी बार उसे सज़दा किया, भूगोल कितनी बार सिमटकर उसके सामने बित्तेभर का हो गया, उसकी गहराई नापते हुए समंदर कितनी बार पसीने-पसीने हुए। जाने कितनी सुनामियों और चक्रवातों का दंभ उसने अपने क़दमों से कुचला। जाने कितने युवाओं के जज़्बातों में वह जन्म लेता रहा बार-बार। उसके जैसे पुत्र को जन्म देने के लिए ललकती रहीं जाने कितनी माताओं की कोख। वह न जाने कितने सपनों में दाख़िल हुआ होगा राजकुमार बनकर। कितने कोरे कागज़ तरसे होंगे उसके एक हस्ताक्षर के लिए। जाने कितनी इच्छाओं को अतृप्त करते हुए वह बनता रहा सागर और दौड़ता रहा अपने 'चांद' की ओर। एक आदमी अपनी एकाग्रता, एकनिष्ठता, मेहनत और लगन से किस तरह बना इतना विराट कि उसके सामने हर ऊंचाई लगने लगी बौनी। अभ्यास ने लिखी सफलता की ऐसी अमिट कहानी, जिसे सुनकर सदियों बाद भी चौड़ा होता रहेगा समय का सीना। कृष्ण का विराट रूप केवल एक बार अर्जुन देखा था, सचिन का पूरी दुनिया ने देखा। बार-बार, कई बार।

क्रिकेट का यह 'भगवान' भले ही मुंबई वानखेड़े स्टेडियम में अंतिम विदाई ले रहा था, मैदान से बाहर जाते हुए गाल पर आंसुओं के मोती गिर रहे थे, दुनिया देख रही थी भावनाओं का महाकुंभ...लेकिन सिसक रहा था मेरा अपना मध्यप्रदेश भी। ग्वालियर का कैप्टन रूपसिंह स्टेडियम याद कर रहा था एकदिवसीय मैचों में लगाया गया इतिहास का पहला दोहरा शतक। इंदौर के नेहरू और होलकर स्टेडियम हिचकियां ले रहे थे उसकी छुअन और पदचाप को याद करके। जिस प्रदेश और उसके शहर इंदौर को पद्मभूषण कर्नल सीके नायडू और पद्मश्री मुश्ताक अली ने क्रिकेट खेलने और देखने का सलीक़ा सिखाया हो, वह भला कैसे न महसूस करता क्रिकेट के 'पैगंबर' की जुदाई का दर्द। जिसकी होलकर टीम ने जीते हों चार-चार रणजी खिताब, जिसके ख़ज़ाने से निकले हों नरेंद्र हिरवानी और अमय खुरसिया जैसे सितारे, वह कैसे भूलेगा कभी अपने आंगन में बिखरी क्रिकेट के 'कोहिनूर' की चमक। खेल के ऐसे रत्न को जो बन गया हो भारत रत्न।

समय की आंख बनकर देखें तो सगुण से निर्गुण हो गया सचिन का खेल, एक ऐसा मंत्र बन गया जिसका जाप कर आने वाली पीढ़िया सिद्ध करेंगी अपना हुनर, एक ऐसा गीत जो अवसाद को बनाएगा नया हौसला, एक ऐसी मिसाल जिसे बताकर फ़ख्र महसूस करेंगे लोग। कबीर ने बिना दाग-धब्बे के जैसे चदरिया ज्यों की त्यों रख दी थी, सचिन ने क्रिकेट की पोषाक रख दी निष्कलंक। भरा-पूरा साम्राज्य छोड़कर चल पड़े बुद्ध की राह पर। क्रिकेट को इतना मान और सम्मान दिलाया कि आने वाली पीढ़िया इस बात पर गर्व करेंगी कि उन्होंने उस खेल को चुना, जिसे सचिन खेला करते थे। आईंस्टीन होते तो बापू की तरह सचिन के लिए भी कोई ऐसा सूत्र वाक्य कहते कि, आने वाला ज़माना भरोसा नहीं करेगा कि हाड़-मांस का कोई आदमी क्रिकेट की साधना कर भगवान बन गया था।
 -ओम द्विवेदी
 नईदुनिया, 17.11.2013 



मंगलवार, 5 नवंबर 2013

अंधेरे के आंगन में रोशनी का महारास

सूरज के पहलू में जिस दीप की कोई औकात नहीं थी, अमावस की छाती पर चढ़कर उसी ने रात को औकात बता दी। सबसे काली रात को उजास का लिबास पहना दिया। मावस अपने तमाम षडयंत्रों के साथ देहरी के इर्द-गिर्द घूमती रही, घर में घुसने की कोशिश करती रही, लेकिन नन्हा-सा दीप इस कदर पहरेदारी करता रहा कि वह सेंध नहीं लगा पाई। अखंड दिखने वाली रात की सत्ता खंड-खंड हुई और दीप ने रोशनी का विजयनाद किया। 

शहर के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक यह दीप कहीं मिट्टी के रूप में था तो कहीं बिजली की लड़ियों की शक्ल में, कहीं सफेद वस्त्रों में दमकता हुआ तो कहीं बेहद रंगीन, कहीं महालक्ष्मी की आराधना करता हुआ तो कहीं पटाखों के साथ आसमान में नाचता हुआ, झोपड़ी में मंद-मंद मुस्काता हुआ तो बहुमंजिला इमारतों पर खिलखिलाता-अट्टहास करता हुआ, बुजुर्गों के चरणों में मत्था टेककर आशीर्वाद लेता हुआ तो बच्चों को गले लगाकर प्यार-दुलार देता हुआ, राजवाड़ा से इतिहास की रोशनी लुटाता हुआ तो मॉल से विश्व बाजार की जयकार करता हुआ। उजाले की सबसे छो
टी इकाई ने शहर के पोर-पोर को अपने रंग से रंग दिया।

दीयों ने सबसे काली रात को भी इतनी खूबसूरत बना दिया कि शरद की पूर्णिमा को भी जलन होने लगी। 
दीये की महाविजय पर पूनम के चांद ने संदेश भेजा-'मेरी मजबूरी है कि मैं नहीं आ सकता अमावस्या के घर। नहीं दे सकता उसे अपनी आभा। उसकी काली करतूतों से नहीं हैं कोई मेरा लेना-देना। डरता भी हूं कि मेरे दामन पर कहीं लग न जाए कालिख। दोनों के अलग-अलग रहते ही बचा हुआ है दोनों का वजूद। मेरी अनुपस्थिति में भी तुम चांद बनकर चमकते रहे धरती पर। जैसे मैं ही बैठ गया हूं मिट्टी के पात्र पर। तुम्हारे रहते किसी ने एक बार भी याद नहीं किया मुझे। सूरज ने चिठ्ठी लिखी-'मैंने कभी तुम्हें अपना वारिस नहीं बनाया, तुम्हारी बेजान-सी हस्ती देखकर मैं हंसता रहा बार-बार, मैं अपने उजाले पर ही इतराता रहा, घूमता रहा पूरब से पश्चिम तक, रोशनी बांटकर समझता रहा खुद को दानी-महादानी। आज तुम्हारी हैसियत देखकर टूट गया मेरा दंभ। आग की पोटली लिए तुम भस्म करते रहे अंधेरे को। जिस छोर पर मैं पहुंच भी नहीं सकता था, वहां तुमने कायम की अपनी सत्ता। अमावस के आंगन में भी तुमने बचा ली मेरी लाज। मेरी सोहबत में नहीं तैयार हो सकता दूसरा सूरज, लेकिन तुमने ज्योति से ज्योति जलाकर तैयार कर दी दीपों की अपराजेय सेना। आज मुझे समझ में आया कि तुम जैसे छोटे-छोटे सूरज को सम्मान देकर ही समर्थ और दीर्घजीवी हो सकता है बड़े सूरज का जनतंत्र। मैं लिख रहा हूं तुम्हारे नाम अपनी वसीयत। तारों ने ट्वीट किया-तुम्हारे साथ हम धरती पर भी करेंगे समूह नृत्य, गाएंगे उजाले का कोरस, कायम करेंगे वंचितों का साम्राज्य। तुम एक साथ कर सकते हो अंधेरे और उजाले का सम्मान।

शहर की दहलीज पर अगर दीया सोलह श्रृंगार करके आता है तो यह शहर भी उसके लिए लड़ता है तूफानों से। उसकी लौ की रक्षा में लगा रहा रहता है निरंतर। होलकरों ने इंदूर की देहरी पर विकास का जो दीप रखा 
था, इंदौर आज उसे मशाल में तब्दील कर चुका है। इंद्रेश्वर से लेकर खजराना के मंदिर तक आस्था के अकंपित दीप जगमगा रहे हैं। ज्वार के शाजे और आलनी भाजी के दीप पर 'स्वाद की लौ पूरे देश को लुभा रही है। अतिथियों के सत्कार के लिए यह जलता रहता है मद्धिम-मद्धिम। यह सेठ हुकमचंद के साथ धन के दीप जलाता है...डीडी देवलालीकर और एमएफ हुसैन के साथ रंगों के ...अमीर खां और लता मंगेशकर के साथ सुरों के...भवानी प्रसाद मिश्र और प्रभाकर माचवे के साथ साहित्य के...सीके नायडू और मुश्ताक अली के साथ खेल के...। यहां की गली का दीप बीआरटीएस बनकर दमकता है, तांगों का दीया हवाई जहाज बनकर आसमान की लंबाई नापता है। लगातार जलते हुए भी वह करता रहता है प्रार्थना कि मिल की चिमनियों की तरह खामोश न हो जाए एक दिन। 

-ओम द्विवेदी
नईदुनिया इंदौर , 04.11.13