शनिवार, 15 मई 2010

सोना है भविष्य, रोना मत

आपको पता चला क्या, अपने मुख्यमंत्रीजी ने विधानसभा में सोना बनाने की मशीन लगवाई है! जिस पारस पत्थर के बारे में बड़े-बूढ़े बताया करते थे, शायद वही लगवाया है। अब वे पूरे प्रदेश को सोना बनाएँगे। उनके जो सहयोगी विधायक और मंत्री बनने के पहले लोहे का भंगार थे, वे अब चमचमाता सोना हो गए हैं। चेहरा भले भंगार जैसा दिखे, लेकिन चमक सोने की हो गई है। बीवी, बच्चे, पुरखे सभी सोने के हो गए हैं। पड़ोसी उन्हें देख-देख ललचाते हैं, अचरज करते हैं। वे तो दुश्मनों को भी सोना बनाने के लिए अंदर बुला रहे थे, लेकिन वे बाहर ही बैठै रहे। दुश्मन विधायकों को लग रहा था कि वे तो पहले से ही सोने के हैं, मुख्यमंत्री उन्हें अंदर बुलाकर कहीं फिर से लोहा न कर दें। भंगार सोना बन सकता है तो सोना भी तो भंगार बन सकता है।

इस पारस पत्थर के सहारे 'साहिब' प्रदेश का भविष्य स्वर्णिम करेंगे। सबसे पहले योजनाओं को सोना बनाएँगे। पारस छूने के बाद सारी योजनाएँ सोना हो जाएँगी। सोना योजनाओं के लिए लूटमार मचेगी और हर कोई चाहेगा कि वह इन योजनाओं को प्राप्त कर ले। सोने को ललकती बेचारी जनता जब इन योजनाओं के दर्शन करेगी तो वह धूल-धूसरित अपनी जिंदगी को धन्य-धन्य मानेगी। वह कोशिश करेगी कि इन योजनाओं के मंगलसूत्र बनवाकर लाडली लक्ष्मी को दे दे। इन योजनाओं से किसान धरती में अनाज की जगह सोना उगाएगा। रोजी-रोटी के लिए जूते का तल्ला घिसवाता नौजवान योजनाओं का कारोबार करेगा। भोपाल से लेकर मिसिरगवाँ खुर्द तक स्वर्णिम योजनाएँ इस तरह रथारूढ़ होकर चलेंगी कि रामराज्य धम्म से आ गिरेगा। जनता के सारे दुःख हिंद महासागर में फेंक दिए जाएँगे और सुख छप्पर तोड़-तोड़कर घरों में डाल दिए जाएँगे।

पारस पत्थर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद जो भी विधानसभा तक पहुँच जाएगा वह सोना होकर ही लौटेगा। अंधा-काना, लंगड़ा-लूला, गूँगा-बहरा भले रहे पर सोने का रहेगा। वह अपने जिन चमचों को चाहेगा सोने का कर देगा। पारस का प्रताप ऐसा होगा कि जिस सड़क पर मुसाफिर गिर-गिरकर अपना पाँव तुड़वाते हैं, वही सड़क ठेकेदार के लिए सोना उगलेगी। जिन नालियों की दुर्गन्ध से लोगों की घ्राणशक्ति जा रही है और वे घर में कम अस्पताल में अधिक रह रहे हैं, उन्हीं नालियों में ठेकेदार के लिए सोना बहेगा। जिन सरकारी दफ्तरों में गरीब की फाइल शतायु हो रही है और जो विभाग लगातार घाटे में हैं, वही अपने अफसरों पर सोना बरसाएँगे। कभी जब उनका लॉकर खुलेगा तो सोना आराम से सोता मिलेगा।

मुख्यमंत्रीजी की सदिच्छा है कि भविष्य में पूरा प्रदेश सोने का हो जाए। दीवारें सोने की, सड़कें सोने की, घर सोने के, नालियाँ सोने की, गाड़ियाँ सोने की, पेड़ सोने के और चिड़िया सोने की। जैसे कभी भारत सोने की चिड़िया था और उसे लूटने के लिए दूर देश से लुटेरे आया करते थे, वैसे ही अपने प्रदेश में भी आएँ। लूटने के लिए नहीं, देख-देख दंग होने। जब चारों तरफ सोना ही सोना दिखाई देने लगेगा तो अपना प्रदेश भी सोने की लंका जैसा हो जाएगा। जिसमें रावण, कुंभकरण, मेघनाद, खर और दूषण जैसे अपराजेय योद्घा रहने लगेंगे। विभीषण को लात मारकर बाहर कर दिया जाएगा। सोना है ही ऐसा कि राजा को ताकतवर कर देता है। रावण-कुंभकरण जैसा।

स्वर्णिम प्रदेश गढ़ने में संकल्पों के ७० सुनार काम करेंगे। कन्यादान से लेकर लेकर भू-दान तक मजे से होगा। अपने लिए सबसे स्वर्णिम संकल्प है कि अब राशन की दुकानें रोज खुलेंगी। मतलब यह कि अगर गाँठ में पैसा होगा तो अन्न खूब मिलेगा और जनता हाथ-मुँह एक कर सकेगी। डर लगता है कि रोज खुलने वाली दुकानों में अगर राशन भी सोने का मिलेगा, तो क्या होगा। बहरहाल सभी नेताओं, अफसरों और गुर्गों-मुर्गों को कह दिया गया है कि प्रदेश का भविष्य जहाँ भी मिले तो उसे पकड़कर लाओ और विधानसभा में रखे पारस पत्थर पर उसका सिर दे मारो। जब तक वह सोने का न हो जाए तब तक पटकते रहो, ताकि आने वाली पीढ़ी कह सके कि हमारा वर्तमान स्वर्णिम है। साँस रोककर देखिए कि अगले चुनाव तक कितने भविष्य स्वर्णिम होकर सदन से बाहर निकलते हैं। फिलहाल स्वर्णिम संकल्प के लिए मुख्यमंत्री की जय बोलिये और उनके दुश्मनों की पराजय।

शनिवार, 1 मई 2010

सूरज की मर्दानगी

सूरज आसमान से इस तरह गोली-बारी कर रहा है जैसे अमेरिका अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर ड्रोन से हमला कर रहा हो। सड़क पर निकलना आग की बारिश में चलने जैसा लगता है। बाहर तो बाहर घर के भीतर भी सूरज इस कदर गर्मी भेज रहा है जैसे पकिस्तान हमारे यहाँ आतंकवादी भेजता है। सेना और खुफिया विभाग के कान भी खड़े नहीं हो पाते और वे हमारा गाल लाल कर चले जाते हैं। गर्मी भी उसी अंदाज में घुसपैठ कर रही है। एसी और कूलर सीमा पर तैनात हैं, लेकिन गर्मी है कि बदन से पसीना निचोड़े दे रही है। मंदिर में जूता चोरी चला जाए तो घर पहुँचते तक धरती पाँवों को ऐसे भूनती है जैसे हर बजट के बाद महँगाई। आह भरते रहें और राह चलते रहें। पुलिस कप्तान होता तो दस-बीस धारा लगाकर जेल में ठूस देता और सड़ाता तीन महीने। ज्यादा टुर्राता तो जिला बदर कर देता।

ऐसे भूखा-प्यासा निकलता है घर से कि खाना-पानी कम पड़ने लगता है। नदी-तालाब पी जाता है, बोरिंग-हैंडपंप पी जाता है, कुएँ-नल पी जाता है फिर भी प्यास नहीं बुझती। बिलकुल बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरह। इसकी प्यास कुछ-कुछ हमारे नेताओं और अफसरों जैसी भी है। वो ऊपर बैठकर धरती का पानी सोख रहा है और ये राजधानी में बैठकर जनता का खून। न धरती का पानी पीकर सूरज अघाता और न जनता का खून चूसकर सरकार। दोनों अंतिम बूँद स्वाद ग्रहण करने की में लगे हैं।

सारी समस्याओं की जड़ यह नामुराद सूरज ही है। अब देखिए न! सरकार के हुकुम पर बच्चे परीक्षा देने के बाद फिर से स्कूल जाने लगे थे, लेकिन इसने अपनी ताकत दिखाकर धारा-१४४ लगवा दी। सब बंद। इसने सरकार को पहले बताया भी नहीं कि हम गर्मियों में तपेंगे इसलिए पहले से इंतजाम कर लो, लू लगने से पहले बच्चों की छुट्टियाँ कर दो, उन्हें दो महीने चैन से जी लेने दो। अब सरकार कोई इतनी ज्ञानी तो नहीं है कि उसे पहले से पता रहे कि ठंडी के बाद गर्मी आएगी और गर्मी के बाद बारिश। उसे तो जैसा बताया जाता है वह मानती है और फटाफट योजनाएँ बनाती है। जैसे ही उसे गर्मी का पता चला छुट्टियाँ हो गईं। सूरज की जरा सी लापरवाही के कारण सरकार को कितना नुकसान हुआ, कितने आदेश निकालने पड़े। सचिवालय की मेहनत और जनता का धन दोनों अकारथ गया। स्कूल लगाओ...बच्चों को स्कूल लाओ...उन्हें किताबें बाँटो...पढ़ने की रुचि जगाओ...एक के बाद एक आदेश चल रहे थे कि सूरज तपने लगा और आदेश निकालना पड़ा कि सबकी छुट्टी कर दो। पहले से बता देता तो आदेशों और फाइलों को थकना नहीं पड़ता।

सूरज बीमारियों से मारे डाल रहा है। सरकार बच्चों को दलिया-दूध खिला रही है, दोपहर का भोजन दे रही है, जो लोग गरीबी रेखा पर चलते-चलते नीचे खिसक गए हैं, उन्हें गेहूँ-चावल दे रही है। रोटी छीनने वाले देश अमेरिका से मक्का मगा रही है तो बम फेंकने वाले देश पाकिस्तान से शकर। सबको खिलाने पर आमादा है। जिन्हें खाना नहीं दे पा रही उन्हें पौष्टिक आश्वासन दे रही है। सरकार के इस सारे किए-धरे पर सूरज दस मिनट में पानी फेर देता है। लोग खा-पीकर घर से बाहर से निकलते हैं और सूरज का चाटा खाकर अस्पताल पहुँच जाते हैं। डॉक्टर किसे-किसे बचाएँ। भला हो बजरंगवली का जो लोगों की साँस थामे हुए हैं। लोग बिस्तर पर पड़े-पड़े प्रार्थना कर रहे हैं कि प्रभु बाल्यकाल की तरह एक बार और सूरज को खा लो। हमारे प्राणों की रक्षा करो।

गरीबी, भुखमरी और बीमारी के लिए लोग नाहक ही सरकार को कोसते हैं। मैं तो कहता हूँ कि इसके लिए यह सूरज ही पूरी तरह जिम्मेदार है। सरकार को इसके खिलाफ जाँच आयोग बनाना चाहिए और जल्द से जल्द सजा तय करनी चाहिए। हो सके तो लाल किले पर फाँसी देने का शानदार आयोजन करना चाहिए। विपक्ष तो माल खाकर किसी तरह सरकार की रक्षा कर लेता है, लेकिन ये सूरज सब कुछ खा-पीकर भी सरकार की लुटिया डुबोने में लगा रहता है। अपनी मर्दानगी से कम सूरज की गर्मी से ही हम चीन को नंबर दो की कुरसी पर धकेलने वाले हैं। उसी की साजिश से हमारी आबादी फल-फूल रही है। लोग सूरज का गुस्सा चाँद उतारते हैं और आँगन में तारों की बारात उतर आती है। सरकार किसको-किसको दाना-पानी दे। सरकार माने या न माने सूरज की सौंपी आबादी ही सरकार की बरबादी का सबसे बड़ा कारण है। सरकार को इससे निपटना चाहिए। पर निपटे कैसे, उसी गर्मी से वोट भी तो पैदा होता है। जो आबादी मुसीबत का जहर है, वही वोट का अमृत भी तो है। फिर तो पूजना पड़ेगा सूरज को।

सुनने में आया है कि सूरज इसलिए गुस्से में है क्योंकि हम पेड़ काटकर घर और सड़क बना रहे हैं, पलँग-सोफा बनवा रहे हैं, लकड़ी जलाकर खाना बना रहे हैं, वगैरह..वगैरह। अरे भैया! पूरी धरती पर पेड़ ही रहेंगे तो क्या हम घर पेड़ पर बनाएँगे। आपको तो सड़क की जरूरत पड़ती नहीं। दिनभर में पैदल ही सारा आसमान नाप लेते हैं। आपके घर किसी के आने की हिम्मत भी नहीं कि पलँग-सोफा की जरूरत पड़े। आपके कोप से डरे तो फिर हम जीते जी मरे। सूरज बाबू ! सौ टके की बात सुनो-हमें अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारना अच्छा लगता है। हम अगर धरती पर पेड़ों को रहने देंगे तो आपका गुस्सा भी नपुंसक हो जाएगा और सारे खुदगर्ज भस्म होने से बच जाएँगे। तुम्हीं तो एक मर्द हो जो नामर्दों को सबक सिखा सकते हो। अभी जितना गुस्साओगे, तीन महीने बाद धरती का आँचल भी तो उतना ही भिगाओगे।

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

मुझको भी तो भ्रष्ट बना दो!

प्रभु! जाने किस घड़ी में मैने तुझसे विद्या का वरदान माँग लिया था। जब माँगा था तो यह सोचकर माँगा था कि यही दुनिया का श्रेष्ठ वरदान है, अब बहुत पछता रहा हूँ। संभव हो तो प्रायश्चित का मौका दो और विद्या, ज्ञान, लेखनी वगैरह अपने माल गोदाम में जमा करवा लो। अपनी मूर्खता और तुम्हारी दी हुई कृपा पर घड़ी-घड़ी रोना पड़ रहा है। कलम ने ईमानदारी का जो कैंसर दिया है, उससे मुक्ति दो। अब तो अपना दिल चौबीस कैरेट भ्रष्ट होने का है। जैसे-तैसे भ्रष्ट बना दो तभी संसार के कष्ट कटेंगे, वरना जीवन इसी तरह तिल-तिल नष्ट होगा। हे अंतरयामी! मुझे किस तरह भ्रष्ट बनाओगे यह तुम जानो, मैं तो केवल भ्रष्ट होने के लिए लालायित हूँ। एक बार संपूर्ण भ्रष्ट कर दो तो मैं जीवनभर तुम्हारी सेवा करूँगा। मंदिर वगैरह बनवा दूँगा। तीर्थयात्रा करूँगा। यज्ञ-पूजन करूँगा। बड़े-बड़े ट्रस्ट बनाकर तुम्हारे नाम का कीर्तन करवाऊँगा। भ्रष्ट होने के बाद मैं यह सब बहुत आराम से कर सकूँगा। पर्याप्त समय होगा।

वैसे तो सारी सृष्टि आपकी ही बनाई हुई है फिर भी इन दिनों की जो दुनिया है, वह मुझे हर पल भ्रष्ट होने के लिए आमंत्रित कर रही है। बड़े-बूढों ने बताया था कि दुनिया का सारा वैभव भ्रष्टाचार की खदान से निकला है। सारी अट्टालिकाएँ, सारी स्वर्ण लंकाएँ, सारी गगनचुंबी यात्राएँ बिना भ्रष्ट आचरण के संभव नहीं हैं। उन्होंने पहले ही कहा था कि तुम भ्रष्ट बनो, लेकिन मेरी ही मति मारी गई थी। देर से ही सही जाग गया हूँ, अब मेरा मार्ग प्रशस्त करो। जबसे यह महँगाई बढ़ी है और आपने बाजार को लुभावनी अदाएँ दी हैं, जबसे रोटी के लिए भूख शीर्षासन करने लगी है और दवा के आगे मर्ज गिड़गिड़ाने लगा है, तब से यह दिल और भी रह-रहकर भ्रष्ट होने का करता है। अपने देखते-देखते सारे संगी-साथी कहाँ से कहाँ पहुँच गए। कोई उन्हें भ्रष्ट होने का प्रमाण पत्र दे न दे, पर उनकी शानो शौकत किसी प्रमाण पत्र की मोहताज नहीं। कभी-कभी लगता है कि भ्रष्टों की बजाय ईमानदारों से ही प्रतिस्पर्घा करूँ, लेकिन जब दौड़ शुरू होती है तो एक भी आदमी नहीं मिलता। अकेले ज्यादा देर तक दौड़ा नहीं जाता। या तो मुझे भ्रष्टों के साथ दौड़ने का मौका दो, या फिर एकाध दर्जन लोग ऐसे भेजो जिनके साथ मैं ईमानदारी की दौड़ लगा सकूँ।

हे जगदीश्वर! मैं जानता हू कि तुम सीधे किसी को कुछ नहीं देते। अपनी कृपा सद्‌गुरुओं के माध्यम से भेजते हो। मैने अपनी विनती इस समय आप तक इसलिए पहँुचाई है क्योंकि इस समय मुझे इस मार्ग पर ले जाने वाले कई सद्‌गुरु धरती पर अवतरित हैं। आप तो बस मुझे इतना ज्ञान दो कि एक सच्चे गुरु का चयन कर सकूँ, जो मुझे शीघ्रातिशीघ्र भ्रष्ट बना दे। भ्रष्टाचार के जिन सद्‌गुरुओं का नाम इन दिनों चलन में है उनमें अपने मध्यप्रदेश के मंत्री कैलाश विजयर्गीय हैं। कहते हैं कि वे बचपन में ईमानदार थे और एक टूटे स्कूटर पर चलते थे, जबसे उन्होंने अपना रूपांतरण किया है। इंदौर शहर की आधी जमीन उनकी हो गई, लक्ष्मी उनके यहाँ पैर प्लास्टर बँधवाकर आराम करने लगी, चारों ओर उनकी जयकार होने लगी। एक ललित मोदी का नाम भी चल रहा है। वे आईपीएल नाम का क्रिकेट खेल खिलाते हैं। मोदी साहब भी रंक से चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं। उनके दुश्मनों की कृपा से पता चला कि उन्हें भी महान भ्रष्ट संस्कारों ने ही यह मान दिया है। एक थरूर साहब हैं, जिनके चेहरे पर पचपन में भी इतनी रौनक है कि महिलाएँ खिंची चली आती हैं और आए दिन उनके नए विवाह की चर्चा रहती है। इच्छाघारी और संत नित्यानंद के इन्हीं संस्कारों ने उन्हें धार्मिक फील्ड का पावर फुल आदमी बनाया। धन-धान्य के साथ स्त्रियों का सुख भी नसीब हुआ। मेडिकल कौंसिल के केतन देसाई साहब भी भ्रष्ट हुए तो उनकी रिश्वत का रेट दो-दो करोड़ तक पहुँच गया। पुराने भ्रष्टों के बारे में बताने का मतलब है आशिकों को बार-बार 'देवदास' पढ़ाना। अब आप जिसकी तरफ संकेत कर दें, मैं उसे अपना गुरु बना लूँ और यात्रा आरंभ करूँ। आप बताने में जितना विलंब करेंगे गुरुओं की संख्या बढ़ती जाएगी। फिर आप भी कन्फ्यूज होंगे और मैं भी।

एक विनती और जगतपति! इस गुप्त विद्या को विलुप्त मत होने दें। भ्रष्ट बनाने के इस अमूल्य नुस्खे को दादी माँ के नुस्खों की तरह गुम न हो जाने दें। इसे वाचिक परंपरा से लिखित परंपरा में लाएँ। जिस विद्या ने समृद्घि के बंद दरवाजे खोले, उसे कुछ खास लोगों के पास ही मत रहने दें, वरना इस देश के आमजन का आपके ऊपर से विश्वास उठ जाएगा। संभव हो तो आईआईएम और आईआईटी जैसे भ्रष्टाचार सिखाने वाले कुछ संस्थान बनाकर विद्यार्थियों का भला करें। वैसे भी इन संस्थानों को आपने इस तरह की विद्या सिखाने का जिम्मा दिया है, लेकिन अब वक्त आ गया है कि जो काम चोरी-छिपे चल रहा है, उसे खुलेआम कर दिया जाए। यदि आप ऐसा करवा पाएँगे तो आने वाली पीढ़ियाँ आपकी एहसानमंद रहेंगी। उन्हें इस हुनर को प्राप्त करने के लिए किसी को तेल नहीं लगाना पड़ेगा।

भ्रष्ट आचरण के लिए आप सम्मान वगैरह की व्यवस्था भी करवा सकते हैं। भारत रत्न, पद्म श्री, पद्मविभूषण आदि सम्मानों के लिए आप इन्हें भी सुपात्र मानें। आखिर देश की तरक्की में उनका योगदान भी तो है। अगर वैश्विक स्तर तक आपकी पहुँच हो तो नोबेल सम्मान इस भ्रष्ट विद्या के लिए भी दिलवाओ। लेखकों को ऐसी मति दो कि वो भ्रष्ट बनाने वाले वेद-पुराणों की रचना करें। जाँच एजेंसियाँ जिन महान आत्माओं को जेल का भय दिखा रही हैं, उन्हें भ्रष्ट बनाने वाले विश्वविद्यालयों में कुलपति-प्राध्यापक बनाकर उनके अनुभव का लाभ लें। दुनिया उनके साम्राज्य का सम्मान करती ही है, उनके चरित्र को भी सम्मान के योग्य बनाएँ।

एक मुहावरा आपने भी सुना ही होगा कि लोहा लोहे को ही काटता है, ठीक उसी तरह भ्रष्ट भ्रष्ट को ही जेल ले जाने की धमकी देता है और तैयारी करता है। जो पुलिस केस दर्ज करती है, उसके बारे में आप जानते हैं कि वह एक एफआईआर दर्ज करने का क्या लेती है! सीबीआई, सीआईडी और लोकायुक्त आदि की जाँच भी कैसे होती है और कौन किसके खिलाफ करवाता है, यह भी आपको पता है। जांच के लिए जो संसदीय कमेटियाँ बनती हैं, उनका न्याय भी आपकी नजर में है। अच्छा माल देने वाला मिले तो पुलिस आपके ही खिलाफ प्रकरण दर्ज कर दे। आप विपक्ष में हों तो सरकार आपके पीछे इन जाँच एजेंसियों को लगा दे। आप भागते फिरें। जब तक आप भ्रष्ट होकर नहीं लौटें और उनकी सेवा में न हाजिर हों तब तक जाँच की दोनाली आपके पीछे-पीछे दौड़े। खैर! आप तो सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हैं। कुछ न कुछ कर ही लेंगे। आप तो मुझ जैसे तुच्छ सेवकों के बारे में सोचें और तत्काल भ्रष्ट बनाएँ। क्षणभर में इतना भ्रष्ट कर दें कि मंत्री-संत्री, दादा-दऊ, अफसर-चाकर सब जलें-भुनें और चुपके से पूछे - 'गुरू भ्रष्ट होने का कोई गुर मुझे भी बताओ न!'

गुरुवार, 25 मार्च 2010

नोटों की माला का अर्थात

बहनजी काँटों भरा सफ़र तय करके आलीशान सिंहासन तक पहुँची हैं, अतः फूलों की माला पहनकर वे काँटों का अपमान नहीं करना चाहतीं।वे जिस समाज का नेतृत्व करती हैं दुनिया आज भी उसे काँटा ही मानती है।दुनिया उस काँटे से अपने पाँव का चुभा काँटा निकालकर फिर उसे बाहर फेंक देती है।उस काँटे की बागड़ बनाकर फसलों और फूलों की रखवाली तो कर लेती है, लेकिन उसको सम्मान नहीं देती।जो फूल काँटों को हिकारत भरी नज़र से देखते हैं भला बहनजी उन फूलों को गले से कैसे लगाएँ।जो फूल समूचे काँटा जाति का संहार कर देना चाहते हैं उन्हें भला वे कैसे दिल के क़रीब रखतीं।इसीलिए उन्होंने फूलों की बजाय नोटों(काँटों)की माला पहन ली।

लोग समझते हैं कि बहनजी रुपयों की भूखी हैं। हमेशा धन बटोरती रहती हैं। कभी जन्मदिन पर, कभी पार्टी फंड के नाम पर तो कभी चुनाव में टिकट देने के नाम पर वे धन संग्रह करती हैं।कहने वालों की जिह्वा जले, लेकिन कहते तो वे यह भी हैं कि बहनजी उसी 'आम' को चूसती हैं, जिसके वोट से आलीशान सिंहासन हासिल करती हैं।बहनजी जहाँ भारतीय मुद्रा का स्पर्श करती हैं तो भाई लोगों का दिल-दिमाग हिलने लगता है।प्रदर्शन करने वाले लोग बहनजी का दर्शन क्या जानें।जिन मायावियों ने धन को माया कहकर सदियों तक लोगों को भरमाया, जिसके अभाव में उनके वोटर मज़दूर, खेतिहार, किसान और बेकार रह गए।उन्हीं रुपयों की माला पहनकर वे अपने वोटरों और भूख से मरें तमाम क्षूद्रजनों का तर्पण कर रही हैं।बहनजी उस माया को भी सम्मान दे रही हैं, जिसे कबीर ने महाठगिनी कहकर लज्जित किया था।आप कोई ठगी थोड़ी कर रही हैं।

बहनजी जानती हैं कि लोकतंत्र बिकाऊ है और उन्होंने यह राज अपने समर्थकों को बताया है।उन्हें मालूम है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, वह कोई कौड़ी दो कौड़ी में तो बिकने से रहा। जब गली-मोहल्लों में कमरे दो कमरे की ज़मीन करोड़ रुपए माँगने लगी है तो भला लोकतंत्र तो लोकतंत्र है। उसकी क़ीमत सारी दुनिया जानती है। इसमें संसद है, न्यायपालिका है, विधायिका है और मीडिया है।सब एक से एक क़ीमती। सबको ख़रीदना है तो पूंजी तो ज़रूरी है न! इस लोकतंत्र को अगर ऊँचे भवनों से देखना है तो मुख्यमंत्री निवास है, प्रधानमंत्री निवास है, राष्ट्रपति भवन है, राज्यपालों की अट्टालिकाएँ हैं, कलेक्टोरेट हैं, एसपी ऑफिस हैं, तहसीलदार, पटवारी तक हैं। सबको ख़रीदना कोई गाजर घास थोड़ी न है! तो बहनजी के प्राणप्यारे यह जानते हैं इसलिए अब वे उन्हें नोटों की माला पहना रहे हैं, जिससे वे थोड़ा-थोड़ा लोकतंत्र ख़रीदती रहें और एक दिन पूरा ख़रीद लें।इससे लोकतंत्र भी बचेगा और सदियों से सत्ता से बाहर धकेले गए लोगों को सत्ता भी मिलेगी।

जो लोग बहनजी के गले में नोटों की माला देखकर जल-हैं भुन रहे और बहनजी की आलोचना कर रहे हैं, दरअसल वे पर्यावरण और प्रकृति के सबसे बड़े दुश्मन हैं। वे नककटे आलोचक यह नहीं जानते कि बहनजी पर्यावरण की रक्षा का पावन संकल्प ले चुकी हैं। वे कली-कली से, पत्ते-पत्ते से, तने-तने और जड़-जड़ से प्यार करने लगी हैं। वे फूलों की माला पहनेंगी तो कितनी टहनियां बाँझ हो जाएँगी, फूलों के कितने पौधे सिसक-सिसककर रोएँगे। वे अगर एक माला रा़ेज भी पहनती हैं तो कुछ दिन में अच्छे फूलों की प्रजाति ख़त्म हो जाएगी।फूल माला बनने के बाद सूख जाएँगे, लेकिन माला बनने के बाद नोटों का हरापन और बढ़ेगा। बहनजी के गले में पहुँचकर नोट और इतराएँगे। नोट पर बैठे गाँधीबाबा जब बहनजी से भेंट करेंगे तो राम से लेकर कांशीराम तक परम प्रसन्न होंगे।नोटों की इस माला में पतझर को स्थान नहीं, यहाँ हमेशा बसंत रहेगा।

रे नामुरादों! बहनजी 'अछूतोद्घार' की तरह 'नोटोद्घार' कर रही हैं।दूसरे दलों के कुबेर इन्हीं नोटों के दमपर इतराते हैं, लेकिन जब सार्वजनिक रूप से इन्हें स्वीकार करने की बात आती है तो नाक-भौं सिकोड़ते हैं।कमरों और तहख़ानों में लेन-देन होता है, लेकिन बाहर सन्यासी बने रहते हैं।गुपचुप लेन-देन करते हैं और विदेशी बैंक भरते हैं।बहनजी को इन नोटों पर दया आई और उन्होंने तय किया कि वे इन नोटों का उद्घार करेंगी।उन्होंने नोटों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया।जिसे मूढजन भ्रष्टाचार कहते थे, बहनजी ने उसे शिष्टाचार बना दिया है।जिसे भी नोटों का 'उद्घार' करवाना हो वे उनके दर पर जा सकते हैं।उनके चहेतों की चाह है कि वे यह माला पहनकर दिल्ली जाएँ और लाल किला पर झंडा फहराएँ।बहनजी यह जानती हैं नोटों की माला से ही वोटों का सफर तय होगा।

गुरुवार, 11 मार्च 2010

प्रधानजी के नाम ख़त

प्रिय प्रधानजी!

सच कहूँ तो आपको प्रिय कहने में भारी कष्ट होता है। लगता है आपको प्रिय कहा और जीभ जलकर राख हो गई, पर क्या करूँ, हम जन्म-जन्मांतर से दुश्मन को भी प्रिय कहते आए हैं, फिर आप तो हमारे भाग्य विधाता हैं। आपकी बात सुनकर कभी-कभी लगता है कि आपके मुँह पर थूक दूँ, लेकिन अपने फेफड़ों में इतना दम नहीं कि उसे दिल्ली तक पहुँचा सकूँ। वैसे भी हम इतने सहिष्णु हैं कि ज़हर खा लेंगे, फाँसी के फंदे पर झूल जाएँगे, अपने ऊपर ही थूक लेंगे, लेकिन किसी का दिल नहीं दुखाएँगे। आप हमारी क़िस्मत की बुनियाद रखते हैं, उसके कंगूरे बनाते हैं, ठीक तरीके से पुताई कर उसे चमाचम करते हैं। हमने अगर धोखे से भी आपको भला-बुरा कह दिया तो कुंभीपाक में सड़ेंगे। अगला जन्म बिगाड़ने से अच्छा है यहाँ जो कुछ ऊँच-नीच है सह लें।

हम जानते हैं आप हमारे लिए रात-दिन एक कर काम करते हैं। अपनी सीमा से उपर उठकर काम करते हैं। आपको बोलने में अतिशय कष्ट होता है फिर भी बोलते हैं। हिंदी बोलने में आपकी जिह्वा को हज़ार बार लकवा मारता है, फिर भी आप तीज-त्योहार पर बोलते हैं। विदेशों से शिक्षा-दीक्षा लेकर हमारे लिए इस निकृष्ठ देश में रहते हैं। जो देश दो कौड़ी के एक पेंटर को नहीं भाता, आप उस देश में तकलीफ सहते हैं। आप चाहें तो शिरडी के साँईनाथ की तरह सोने का सिंहासन बनवा लें और भक्तों से सुबह-शाम की आरती करवाएँ, फिर भी आप लोकसभा की अदना सी कुरसी पर बैठते हैं और निकृष्ठ विपक्षियों की गाली सुनते हैं। जो हाथ आप खुलेआम अमेरिका से मिलाते हैं, चोरी छिपे पाकिस्तान से मिलाते हैं, चीन-रूस से मिलाते हैं, उस महान हाथ को कभी-कभी भूखी जनता की ओर भी बढ़ा देते हैं। आपकी इस महानता पर प्रश्नचिन्ह लगाऊँ तो रौरव नरक में पड़ँू।

आपके राज में दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की हो रही है। सेठ-साहूकार बढ़ रहे हैं, अमीर बढ़ रहे हैं, शेयर और सोने के भाव बढ़ रहे हैं, मोटरकारें बढ़ रही हैं, हवाई जहाज़ बढ़ रहे हैं, साधु-संत बढ़ रहे हैं, एटमबम बढ़ रहे हैं, नेता बढ़ रहे हैं, वोटर बढ़ रहे है। चारों तरफ बसंत दिख रहा है। सबकुछ लहलहा रहा है। इन सबके बीच महँगाई बढ़ रही है और ग़रीब भी बढ़ रहे हैं। थोड़ी लूट-खसोट और भुखमरी बढ़ रही है। आतंक बढ़ रहा है, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दखल बढ़ रहा है। आपको बुरा तब कहें जब कुछ घट रहा हो। देश की सीमा अगर थोड़ा-बहुत घट भी जाएगी तो उससे क्या, वैसे भी हमारे यहाँ राजा जब प्रसन्न होता था तो दो-चार गाँव बाँट देता था। वे रिआया को बाँटते थे आप पड़ोसी मुल्कों को बाँट रहे हैं। आपके निरंतर बढ़ते प्रगतिशील सोच और दानवीरता को प्रणाम।

जब दाल-रोटी महँगी होती है और किराने की दुकान पर तनख्वाह रेगिस्तान के पानी की तरह पलभर में सूख जाती है तो लगता है बरसों पुरानी अपनी टूटी चप्पल की प्राण प्रतिष्ठा अख़बार में छपी आपकी फोटू पर कर डालूँ, विपक्षी दलों की तरह आपका पुतला फूँक दूँ। फिर लगता है इससे कुछ होता तो अब तक हो गया होता। भरी महफिल में पत्रकार ने मंत्री को जूता मारा, उससे क्या हुआ। आपने जबसे बता दिया है कि महँगाई देश की तरक्की के लिए बढ़ रही है, तबसे गुस्सा थोड़ा कम हुआ हैं। लगता है चलो हम भूख मर जाएँगे तो मर जाएँगे, लेकिन औलादें मज़े में रहेंगी। जबसे आपने कहा है कि महँगाई दुनिया की देन है तबसे मन को संतोष होता है। लगता है एक हमी महँगाई की मार से नहीं कराह रहे हैं, बिलबिला रहे हैं, बल्कि सारी दुनिया की पीठ इसी से लाल है। लगा जब दुनिया का बाज़ार हमारे देश में आकर हमें अपार सुख दे रहा है तो दुःख कहाँ जाएगा। मीठा खा-खाकर पेट में कीड़े हो रहे हैं तो कड़वा कौन गप करेगा। अतः यह महँगाई भी सिरोधार्य है और पूरे भक्तिभाव से दिल आपकी जय-जयकार कर रहा है।

लोग कहते हैं डीजल-पेट्रोल की क़ीमतें बढ़ाना आम आदमी के ख़िलाफ़ और आपने ऐसा करके जनविरोधी काम किया है। ऐसा अज्ञानीजन और स्त्री-किसान विरोधी लोग कहते हैं। आप स्त्रियों के कितने बड़े हित चिंतक है, इसका प्रमाण आपने संसद में महिला विधेयक पेश और कुछ-कुछ पास करवा कर दिया। आपको किसानों की चिंता है यह आपने आम बजट में कर्ज की व्यवस्था करके बताया है। सरकार से कर्ज लो और फसल सूखने के बाद भी तुम खूब फलो-फूलो। डीजल और पेट्रोल की क़ीमतें आपने इसलिए बढ़ाई हैं ताकि महिलाएँ पुरुष समाज से तंग आकर जलने-भुनने में इसका इस्तेमाल नहीं करें। किसान भी मरें तो कुएँ में कूदकर और फाँसी लगाकर नितांत देसी तरीके से मरें। दूर देश की धरती से आए इस बेशकीमती पदार्थ से नहीं। आपमें देश के प्रति प्रेम कूट-कूटकर भरा है, इसलिए अपने मुल्क को पराए मुल्क के तेल से जलाना नहीं चाहते। हम आपके देशप्रेम के आगे नतमस्तक हैं।

यूँ तो आप वैसे भी जनता की बात नहीं सुनते फिर भी मेरा निवेदन है कि कभी भी जनता के बहकावे में नहीं आएँ। यह जनता होती ही इतनी नासुकरी है कि उसे अपने पेट से मतलब होता है। उसे देश और दुनिया की तरक़्क़ी से न कोई लेना-देना है और न उसकी चिंता। उसे तो आपका नाम तक नहीं मालूम। वह तो केवल सरकार जानती है और उसी की जय-जयकार करती है। अब सरकार में घोड़ा है कि गधा, इससे भी उसका लेना-देना नहीं है। जनता पाँच साल में एक बार वोट डालती है, आप जिसके लिए दारू-कंबल बँटवा देते हो, उसके पक्ष में मतदान कर देती है। वोट देने के बाद हमेशा सरकार से नाराज़ रहती है। केरोसिन न मिले तो नाराज़, मज़दूरी न मिले तो नाराज़, ग़रीबी रेखा का कार्ड न मिले तो नाराज़, वृद्घावस्था पेंशन न मिले तो नाराज़, दलिया-दाल न मिले तो नाराज़। यह आज़ादी के पहले भी नाराज़ थी और आज़ादी के बाद भी नाराज़ है। यह नाराज़ न रहे तो मरी-मरी दिखती है। इसलिए आप तो जनता की सोचने की बजाय देश और विदेश की सोचो, वरना यह तुच्छ जनता आपको जीने नहीं देगी।

कुछ लोग कहते हैं कि आपके राज में इस देश को विदेशी ताक़तें चला रही हैं। हमारे देश में आतंकवादियों को पाकिस्तान चला रहा है, बाज़ार को चीन, जापान और अमेरिका चला रहा है, अर्थव्यवस्था को विश्वबैंक चला रहा है। व्यवस्था भगवान भरोसे। वे जगत निंदक यह नहीं जानते कि आपके पास चौबीसों घंटे एक विदशी ताकत है जो आपको चला रही है। आपने अपनी आत्मा उसके पास सुरक्षित रखी है। इसलिए उसकी आवाज़ आपके आत्मा की आवाज़ होती है। यह देश चीन, अमेरिका के भरोसे चले या भगवान के, चल तो रहा है। आपके सिर यह पाप तब जाए, जब देश रुक जाए। मैं आपके चलाने की क्षमता का कायल हूँ और जब तक यह देश चलता रहेगा तब तक आपकी जय-जयकार करते रहेंगे। मैं तो केवल देश के चलने पर यकीन करता हूँ, चला-चलाकर आप इसे कहाँ पहुँचाएँगे, यह आप जानें और आपकी सरकार।

आपका

जनता के बीच बजबजा रहा एक जन

गुरुवार, 4 मार्च 2010

अद्‌भुत...अकल्पनीय...

दोस्तों, कई महीनों बाद ब्लॉग पर अपना मिलना हो रहा है। ग्वालियर में सचिन तेंदुलकर ने २०० रन बनाकर एकदिवसीय मैचों के इतिहास में विश्व कीर्तिमान रचा। २४ फरवरी को ही नईदुनिया के लिए मैंने यह टिप्पणी लिखी। पोस्ट करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा। विलंब के लिए क्षमा याचना सहित...

अद्‌भुत...अकल्पनीय...अविश्वसनीय...अविस्मरणीय...अद्वितीय...अतुलनीय...शब्दकोष में इस तरह के जितने भी शब्द हैं, आज इस बल्लेबाजी पर कुर्बान। ग्वालियर किले की प्राचीरों से इतिहास सचिन की क्रिकेट कला प्रदर्शनी देखने के लिए बार-बार सिर उठा रहा था। मजार से मियाँ तानसेन झाँक रहे थे कि कौन है जो गले से नहीं बल्ले से राग हिंडोल, मुलतानी , मालकोस और यमन सुना रहा है... कौन है जो करोड़ों लोगों को सम्मोहित किए हुए लकड़ी के बल्ले से ही कभी दादरा तो कभी ठुमरी गा रहा है। बल्ले की गायकी ऐसी कि विलंबित में आत्मा निचुड़ जाए और द्रुत ऐसा कि लगे कहीं धड़कनों की रफ्तार न ठहर जाए! जिस खेल को गोरे अपना कहते हैं, वह सचिन के हाथों ग्वालियर में धन्य हुआ। खेल के रसिकों ने कैप्टन रूपसिंह मैदान में किक्रेट की सर्वोत्कृष्ठ पारी देखी, संगीत प्रेमियों ने तानसेन समारोह का आनंद लिया तो शायरी के चाहने वालों के लिए लिटिल मास्टर का हर अंदाज गालिब और मीर का शेर था। उनकी अदा में कभी बिहारी का श्रृंगार था तो कभी नजरूल की क्रांति। जिन्होंने भी यह पारी देखी उन्होंने क्रिकेट का शाही स्नान किया। महाकुंभ में पवित्र हुए। जो चूक गए वे तब-तब पछताएँगे, जब-जब इस महान पारी का जिक्र होगा।

सचिन की इस पारी से भारतीय क्रिकेट की छाती गजों चौड़ी हो गई है। क्रिकेट के हमारे पूवर्जों का तर्पण तो हुआ ही, स्वर्ग में बैठे डॉन ब्रेडमैन ने भी यह मैच देखकर सचिन का कद नापा होगा। दुनिया के वे किक्रेटर, जिन्हें सचिन के आसपास होने का भ्रम है जल भुन गए होंगे। जिन्होंने भी कभी हाथ में बल्ला पकड़ा होगा, उनके लिए एक बार फिर सचिन 'सुमेरु' हो गए। किक्रेट की दुनिया के बड़े-बड़े धुरंधर चार-छः साल मैदान में बिताने के बाद 'सन्यास' ले लेते हैं, लेकिन सचिन पिछले बीस वर्षों से एक दृढ 'सन्यासी' की तरह मैदान में साधनारत हैं और बल्ला कीर्तिमानों की फसल काट रहा है। ईश्वर ने अगर सचिन को क्रिकेट के लिए गढ़ा है तो सचिन ने क्रिकेट को अपने लिए।

ग्वालियर में सचिन क्रिकेट में नए राग की रचना कर रहे थे, क्रिकेट की किताब में निराला की तरह नया छंद गढ़ रहे थे, लियोनार्दो द विंची की तरह कोई मोनालिसा बना रहे थे।जिन्होंने भी यह मैच देखा उन्हें यकीन नहीं हो रहा था वे किक्रेट देख रहे हैं या कोई चमत्कार है जो उनकी आँखों के सामने घटित हो रहा है। वे अपनी एकाग्रता, कौशल और कलात्मकता से एकदिवसीय क्रिकेट के इतिहास में एक ऐसा हिमालय बना रहे थे, जिससे टकराकर पूर्व-पश्चिम की सारी हवाएँ शर्म से पानी-पानी हो जाएँ। इस हिमालय के समक्ष कुछ मस्तक श्रद्घा से नत हैं तो कुछ इसकी ताकत के आगे।

सचिन ने क्रिकेट को जिस तरह अश्वमेध यज्ञ की तरह साधा है, पूजा है और दिग्विजयी हुए हैं, निकट भविष्य में उनके छोड़े अश्व को पकड़ पाना किसी भी क्रिकेट के भूपति के वश की बात नहीं। क्रिकेट की इस मीनार को सलाम। इस ताजमहल को लाखों बोसे। देश की इस धड़कन को प्यार।


-ओम द्विवेदी

बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

छुट्टियों के पीछे- पीछे दफ्तर

कई महीनों बाद लंबी छुट्टी पर गया था। दफ्तर छोड़कर। दीवाली के बहाने छुट्टी मिली थी। यह तो हमारे दफ्तर की कृपा थी कि उसने इतने आसान बहाने पर अवकाश स्वीकृत कर दिया, वरना रिश्तेदारों की शादी करवानी पड़ती, बीवी को बीमार करना पड़ता, दादी जो बीस साल पहले देवलोक को पधार चुकी हैं, उन्हें फिर से स्वर्गवासी करना होता, डॉक्टर से खुद के बीमार होने की पर्ची बनवानी पड़ती, वगैरह...वगैरह। सच पूछिये तो मैं अपने दफ्तर का इसीलिए प्रशंसक हूँ क्योंकि यहाँ छुट्टियों के लिए अपनी रचनात्मकता का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना पड़ता। तनख्वाह कम हो सकती है, इंक्रीमेंट का टोटा हो सकता है, बोनस के लाले पड़ सकते हैं, लेकिन छुट्टियाँ दिल खोलकर मिलती हैं। दूसरों के यहाँ तो अफसर छुट्टियों पर भी कुंडली मारे बैठे रहते हैं।

दफ्तर छुट्टियाँ देने में भले ही उदार हो लेकिन ज्यादा ग्रहण करने में अपन ही फटी में आ जाते हैं। लगता है लंबी छुट्टी न स्वीकृत हो जाए। छुट्टियों पर जाने से पहले यह सोचकर गया था कि अपने साथ राई-तोला भी दफ्तर लेकर नहीं जाऊँगा। घर में पूरा घर का होकर रहूँगा, लेकिन कसम रोजी की दस दिन की छुट्टी में दिन में दस बार दफ्तर लिपट-लिपट कर रोया। आँसू बहा-बहाकर बोला, हमें छोड़कर कहाँ पड़े हो। राम ने जितने बरस बनवास में काटे तकरीबन उतने ही अपन को अखबार में काटते हुए। रात-रातभर आँखें फाड़कर खबरें खोदने की इस कदर आदत हो गई है कि शाम को घर पर रहना किसी अनहोनी की तरह लग रहा था। हर शाम को लगता था कि नौकरी ने मुझे तलाक दे दिया है। घर में कोई मिलने आता तो लगता खबर देने आया है। बात-बात में नजरें खबर तलाशने लगतीं। मैं अगर दूर बैठकर खुद को देखता तो पागल जैसा ही पाता। फिर भी सारे परिजन खुश थे कि मैं कई महीनों बाद छुट्टी पर हूँ और घर पर हूँ।

छुट्टियों की तीसरी-चौथी रात सभ्य और सुसंस्कृत इंसानों की तरह रात दस बजे सो गया। रात बारह बजे अचानक सपना आया कि डेडलाइन पर पन्ने नहीं छूटे हैं और आज अखबार लेट हो जाएगा। फिर संपादक का चेहरा दिखा, सुबह की मीटिंग दिखी, सर्कुलेशन वालों की धमकियाँ दिखीं और अंत में अपना इस्तीफा अपने आप मंजिल की ओर जाता दिखा। अचकचाकर उठ गया और पूरी रात इस्तीफा पकड़ता रहा कि वह पुष्पक विमान पर सवार न हो जाए। फिर तो नीद ही काँच के टुकड़े की मानिंद पलकों में चुभती रही।

वर्षों की साध थी कि सवेरे का सूरज देखूँ। छुट्टियों पर यह इच्छा भी पूरी करनी थी। जिस शहर में सूरज सवेरे कोंच-कोंचकर जगा देता था, वहाँ सूरज बड़े कॉम्पलेक्स के पीछे आ गया था, अतः बिना बाहर निकले उसे देखना मुनासिब नहीं था। सुबह उठा। बाहर निकला तो वह धुँधला-धुधला था और आधा शहर फेंफड़ों में हवा भरने के लिए सड़कों पर घूम रहा था। सूरज वैसा ही था, जैसा कभी-कभार अखबार के पन्नों पर छापा जा चुका था। उसे अगली छुट्टी तक लिए देख लेना था, अतः जीभर कर देखा। लगा अच्छा है कि यह सूरज मेरी तरह अखबार में नौकरी नहीं करता, वरना धरती के आधे लोग तो उसके इंतजार में ही मर जाते। धरती सोती रह जाती। मैं अगर प्रधानमंत्री होता तो चैनलों में दिनभर यह खबर चलती कि मैने सूरज देख लिया। खैर!

दस दिन की छुट्टी बिताने के बाद चलने का समय आया तो घर रोकने लगा। पलभर के लिए लगा कि एक-दो दिन और रुक जाया जाय। बहाना बना दिया जाए कि रेल का रिजर्वेशन नहीं मिला। कल का या परसों का मिला है, लेकिन रुकने का साहस नहीं हुआ। लगा ज्यादा छुट्टी मनाकर लौटूँगा तो दफ्तर भले पहचान ले, लेकिन कहीं आठ कॉलम बावन सेंटीमीटर का अखबारपह ही चानने से न इंकार कर दे। कुल मिलाकर छुट्टी देकर भी दफ्तर पीछे-पीछे लगा रहा।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009

नज़र शरीफ़ों की चुपके से तालिबान बनी

दोस्तों! कई दिनों से व्यंग्य पोस्ट कर रहा हूँ। आज आपको ग़ज़लों से रूबरू कराते हैं। सामयिक ग़ज़लें। इन्हें आप व्यंग्यनुमा ग़ज़ल या ग़ज़लनुमा व्यंग्य कह सकते हैं। प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'समावर्तन' ने सितंबर अंक में इन ग़ज़लों को प्रकाशित किया है।

मेरी बस्ती की मुलक में नई पहचान बनी।
एक गली हिन्दू तो एक मुसलमान बनी।

दंगों ने बदल दी शहर की आबोहवा,
किताब बच्चों की गीता कहीं कुरआन बनी।

सहम-सहम के परिंदे उड़ान भरते हैं,
नज़र शरीफ़ों की चुपके से तालिबान बनी।

मजहब का सियासत से गठजोड़ ग़ज़ब है,
जनमों की आस्था कुरसी की पायदान बनी।

पहचानना मुश्किल है क़ातिल की शक्ल को,
बम छिपाने की महारत बहुत आसान बनी।

शहर से रूठ गया प्यार का मौसम यारो,
आजकल जिंदगी नफ़रत का संविधान बनी।

सोते में चीख़ता है सुल्तान आजकल

टूट पड़ा आँगन में आसमान आजकल।
साँसों में उठ रहा है तूफान आजकल।

कबूतर ने जने हैं कई नन्हें कबूतर,
डर-डर के बाज भरता है उड़ान आजकल।

फ़क़ीर के कदमों में है रफ़्तार कुछ अधिक,
सोते में चीख़ता है सुल्तान आजकल।

पड़ोसी का घर खंगालते खंजर लिए हुए,
तकिए के नीचे छिप गया शैतान आजकल।

मुर्दा से दिखे चेहरे जो भी दिखे यहाँ,
हँसने लगा है बस्ती में शमशान आजकल।

पहुँचा है माँ की कोख तक बाज़ार का दख़ल,
सामान की मानिन्द हैं नादान आजकल।

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009

आज मैं गाँधी बन गया

कल सुबह जब कैलेण्डर पलट रहा था, तभी इस बात का ज्ञान हो गया था कि आज २ अक्टूबर है और यह देश मोहनदास करमचंद गाँधी उर्फ महात्मा उर्फ राष्ट्रपिता का जन्मदिन मनाएगा। अतः हर साल की तरह एक बार फिर मेरे पास मौका था गाँधी बनने का। मैंने इस सुअवसर को झपटकर पकड़ा। बक्से में रखे खादी के कुरते को सुबह-सुबह ही धारण कर लिया। मल्टीनेशनल कंपनियों के सारे जींस, जूते, टी-शर्ट वगैरह संदूक में उसी तरह रख दिया जैसे सालभर खादी रखी रहती है। ३६४ दिन अगर बक्से को खादी का सुख मिलता है तो एक दिन जींस, टी-शर्ट और जूते वगैरह का सुख भी मिलना चाहिए।

अब इस बात में शंका-कुशंका तो रही नहीं कि गाँधीजी का जन्मदिन है तो पूरे दिन कार्यक्रम होंगे और सब जगह खादी धारण किए हुए अतिथिओं की जरूरत होगी। कार्यक्रमों की संख्या इतनी अधिक है कि खादीवाले हर इंसान को एक दिन का रोजगार अवश्य मिलेगा। मैंने अपने बदन टंगे कुरते को भरोसा दिलाया कि आज के दिन उदास होने की जरूरत नहीं है। शाम तक निश्चित ही तुम्हें एक भव्य कार्यक्रम मिलेगा और सारे लोग तुम्हारी ओर घूर-घूरकर देखेंगे। बक्से में रखे-रखे तुम्हारे भीतर जो बास समा गई है उस पर आज गुलाब के फूल भी शरमाएँगे।

खादी धारण करने के साथ ही मैंने हमेशा की तरह ढेर सारे संकल्प भी लिए-राष्ट्रपिता भले बन जाऊँ, राष्ट्रपति कभी नहीं बनूँगा। कोई कितना भी पकड़-पकड़ कर बनाए प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री जैसे राजनीतिक पदों पर बैठकर मैं अपना जीवन कलंकित नहीं करूँगा। अंग्रेजों के बनाए सारे पदों, यथा-एसपी, कलेक्टर, तहसलीदार, बाबू वगैरह बनकर अंगरेजों का पाप नही ढोऊँगा। प्यास से तड़फ-तड़फकर प्राण भले ही चले जाएँ, लेकिन मद्यपान नहीं करूँगा। भूखे मर जाऊँ लेकिन मांस नहीं खाऊँगा। आज के दिन किसी भी स्थिति में कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं करूँगा। दिनभर में दो-चार किलोमीटर पैदल जरूर चलूँगा। सालभर भले ही मैंने दूसरों के गाल पर चाटा जड़ा है, लेकिन आज अगर कोई एक गाल पर चाटा मारेगा तो मैं दूसरा गाल भी उसके आगे कर दूँगा। अगर कहीं सत्य बोलने का मौका मिला तो पूरी ईमानदारी से बोलूँगा। चोरी-भ्रष्टाचार से भरे पेट में आज पाप का एक दाना भी नहीं डालूँगा। पूरी तरह अस्तेय और अपरिग्रह। जायज और नाजायज दोनों किस्म की पत्नियों से कह दिया है कि आज ब्रह्मचर्य प्रयोग करूँगा। कल तक भले गरीब का खून चूसा हो, लेकिन आज उसे हरिजन कहूँगा और आज के दिन उसे समाज में सम्मान दिलवाऊँगा। घिन लगे तब भी कोढ़ियों की सेवा करूँगा। बस्तियों में झाड़ू लगाऊँगा। पत्नी से कह दिया कि चाहे जो हो जाए, आज टॉयलेट तुम्ही साफ करना, वरना मैं तुम्हें घर से बाहर निकाल दूँगा। वगैरह-वगैरह...

जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, संकल्पों के बोझ से हमारी कमर टूटने लगी। दोपहर को लगा कि खादी और संकल्प धारण किए हुए पूरे छः घंटे हो गए, लेकिन किसी नामुराद आयोजक की अब तक मुझ पर नहीं पड़ी। एक बारगी लगा कि सब उतार कर आले पर रख दूँ, लेकिन दूसरे पल फिर लगा कि अभी पूरा दिन है, देर रात तक आयोजन चलेंगे। किसी न किसी की नजर तो पड़ेगी। गत वर्ष तक जिन्होंने बुलाया था क्या वे सारे आयोजक हमें भूल गए होंगे। सालभर में क्या गाँधी के इतने सेवक तैयार हो गए कि मेरे जैसा पुराना गाँधीवादी भुला दिया गया।

दोपहर पल्ला झाड़कर चली गई और कोई नहीं आया। मैंने फिर भी सुबह लिया हुआ संकल्प कायम रखा और बकरी का एक गिलास दूध पीकर थोड़ा और इंतजार किया, फिर थोड़ी सलाद और चटनी लेकर दोपहर का खाना निपटाया। खाना पिछले साल की तरह ही बेस्वाद लगा। लगा अगर यह संकल्प पूरे तीन सौ पैंसठ दिन टिक गया तो जीवन नरक हो जाएगा। पीजा-बर्गर, मुर्ग-मसल्लम से लेकर खीर-पुडी तक हमारा नाम ले-लेकर मातम मनाएँगे। खैर...

भोजन प्रसाद के बाद बाहर निकला ही था कि दौड़ते हुए एक सज्जन आए और उन्होंने कहा कि मोहल्ले में गाँधी जयंती का आयोजन है, हम लोगों ने पार्षद को मुख्यअतिथि बनाया था, वह कहीं और चला गया। अब आप ही पधारिए, कार्यक्रम जल्दी करना है। हमें लगा कि हमने सुबह से जो इतने संकल्प ढोए हैं, क्या मोहल्ले के मुख्यआतिथ्य में ही उनका स्वर्गवास हो जाएगा। मैं अभी इतना भी तो नहीं गिरा हूँ कि मुख्यअतिथि बनने के लिए पार्षद का विकल्प बनूँ। मैंने सज्जन को यह कहते हुए झटपट मना किया कि अभी मुझे तीन बजे की प्रार्थना पर जाना है। शाम को बड़े मैदान पर गरीबों को कपड़े बाँटने के लिए मुख्यमंत्री को आना था, मुझे पता था कि इस अवसर पर एक गाँधीवादी का सम्मान किया जाना है और उन्हें फिलहाल कोई मिल नहीं रहा है। जो बड़ी सेटिंगवाले गाँधीवादी थे उन्हें दिल्ली में, जो उनसे थोड़ा कम थे, उन्हें भोपाल में सुबह ही सम्मानित किया जा चुका है। लोकल कोई इतना बड़ा गाँधीवादी नहीं, जो गाँधीगिरी के अलावा कुछ और न करता हो। मुख्यमंत्री के लोकल चमचों से इधर-उधर से कुछ जुगाड़ अपना भी था।

उधर भोपाल से मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर उड़ा होगा कि इधर हमारे पास कार्यक्रम में शामिल होने का न्यौता आया। मुझे अपने कुरते पर गर्व हुआ। मुख्यमंत्री से श्रेष्ठ गाँधीवादी का सम्मान लेकर मैं कुछ हल्का हुआ। घर आया, सम्मान को बैठक कक्ष में टांगा और दिनभर से जिस बोझ से कमर टूट रही थी, उसे उतारकर संदूक में रख दिया।

बुधवार, 30 सितंबर 2009

दूसरे रावण की तलाश में राम

मैं दशहरे की धूमधाम देखकर लौट रहा था कि देर रात राम से मुलाकात हो गई। जटाएँ बिखरी हुई, पसीने से तरबतर, गैरिक वस्त्र धूल-धूसरित, चेहरे पर परेशानियों की अनगिनत रेखाएँ, आँखों में आँसू थामे हुए, तकरीबन पराजित से। पहले रामलीला में और फिर टीवी में उनकी शक्ल देखते हुए उनसे पुराना परिचय-सा लगा। बिना कुछ सोचे-विचारे मैंने उनसे उनका हाल पूछा-

-कुछ परेशान से दिख रहे हैं राम। हमें लगता है आपने आज ढेरों रावण मारे हैं। रावण मार-मारकर थक गए हैं?

-नहीं वत्स! तुमने गलत समझ लिया। मैं शाम से ही रावण को खोज रहा हूँ। हाथ में धनुष बाण लिए रावण की तलाश में भटक रहा हूँ, लेकिन रावण का कोई अता-पता नहीं। मैं चिंतित हूँ कि अगर आज की रात रावण नहीं मार पाया तो रावण कैसे मरेगा और लोग मुझे राम कैसे मानेंगे?

-शाम से ही धू-धू कर इतने रावण जल रहे हैं और आप कहते हैं कि आपको रावण मिला ही नहीं। आज तो पूरे शहर में केवल रावण ही रावण दिख रहा था। आप कैसे राम हैं?

-मेरी यही तो मुश्किल है। मैं कैसे बताऊँ कि मै कैसा राम हूँ। आज जगह-जगह नकली रावण खड़े थे और उन्हें नकली राम मार रहे थे। मैं रावण की तलाश में जहाँ भी गया लोगों ने मुझे राम मानने से इंकार कर दिया।

-कोई बात नहीं प्रभु, चलिए मैं एक रावण बनाता हूँ और आप उसका वध करिएगा। मैं उसमें दो-चार बम रख दूँगा। एटम बम जैसी आवाज होगी। मोहल्ले के बच्चे ताली बजाएँगे। आपको भी मजा आएगा और बच्चों को भी।

-मैं मजे लेने के लिए इस धरती पर नहीं घूम रहा हूँ वत्स! मैं तो आज सचमुच ही रावण मारने निकला था, लेकिन वह जाने कहाँ छिपा बैठा है।

-आप तो अंतर्यामी हैं। जरूर जानते होंगे कि वह कहाँ छिपा है। आँखें बंद करके देखिए न!

-जिस रावण को मैंने पहली बार मारा था, वह धरती का सबसे मायावी राक्षस माना जाता था। इसके बाद भी मैने उसका वध किया। अब जिस रावण का मैं पीछा कर रहा हूँ, वह उससे भी मायावी, उससे भी चतुर, उससे भी ज्ञानी और उससे भी अधिक अपराजेय है।

-कैसे?

-आज शाम को जब मैंने पहली बार रावण को तलाशा तो वह अट्टहास करता मिला। मेरा उपहास करता हुआ। दूर से ही चिल्लाते हुए उसने कहा कि तुम क्या अब तो सारे देवी-देवता मिलकर भी मुझे नहीं मार सकते। उसके दस सिर गर्व से तने हुए थे। हँसता भी दस मुखों से था। मैं अपनी सारी शस्त्र विद्याओं के बलबूते मारने के लिए जैसे ही उसके पास गया, उसने अपने नौ सिर झट से छिपा लिए और भद्र दिखने लगा। मैने उसकी माया मारने के लिए जैसे ही तीर धनुष पर चढ़ाया, सारी जनता मेरी ओर दौड़ पड़ी। कहने लगी यह मेरा अन्नदाता है। मेरा पालनहार। इस पर वार करने वाले तुम कौन हो। मेरी जयकार करने वाले सारे लोग उस तरफ दिखे और मैं वहाँ से अपनी जान बचाकर भागा। मैं अपने भक्तों को मार नहीं सकता और भक्त मुझे मारें यह देवताओं को अच्छा नहीं लगेगा।

-फिर क्या हुआ?

-मैने उसी रावण को फिर दूसरी शक्ल में देखा। उसे लगा कि आज नहीं तो कल लोग मुझे पहचान जाएँगे। इसलिए उसने अपने दस सिरों का विसर्जन कर लिया। उसने मेरी ही शक्ल धारण कर ली। जगह-जगह रावण की जगह राम दिखाई दे रहे हैं। जैसे बालि-सुग्रीव युद्घ में बालि को पहचानने में मुश्किल हो रही थी, उसी तरह राम की शक्ल में रावण को पहचानना मुश्किल है। मैं जानता हूँ रावण अभी नहीं मरा है, फिर भी असहाय हूँ। मैंने एक चीज और देखी है..

-वह क्या प्रभु!

-अब लोग रावण के अभ्यस्त हो गए हैं। अब उन्हें रावण राक्षस नहीं लगता। जब साधुओं और सज्जनों को त्रस्त करता है तो लो कहते हैं, यह उसका काम है। जब सीता पर कुदृष्टि डालता है, तब भी लोग यही कहते हैं। सोने की लंका देखकर भी लोग सहज ही कह देते हैं कि वह राजा है, सोने की लंका उसकी नहीं होगी तो गंगू तेली की होगी? पहले तो रावण सज्जनों के खून और उनकी हड्डियाँ लेता था, तो कुछ तकलीफ भी होती थी। अब तो कभी-कभार केवल वोट लेता है, इसलिए लोगों को तनिक भी तकलीफ नहीं होती?

-तो क्या अब वह इसी तरह जीवित रहेगा? उसके अंत का कोई उपाय नहीं?

-चिंता मत करो वत्स! अब मैं उसे 'वोट' बनकर मारूँगा। मैं जल्द ही 'मतावतार' लूँगा।